राष्ट्र के परावलंबी होने की पीड़ा आचार्य जी को बहुत सताती थी, दूसरी ओर तप-साधना की ललक भी पूरी थी । महापुरश्चरण साधना (अनुष्ठान) के साथ-साथ, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी सक्रिय रहे । गांधी जी के आह्वान पर कांग्रेस के स्वयंसेवक दल में भरती हुए, कई बार जेल भी गए । महामना मालवीय जी, स्वरूपरानी नेहरू, देवदास गांधी एवं रफी अहमद किदवई के साथ आसनसोल जेल में रहे । आगरा जिले के जरार स्थान पर हुए सत्याग्रह आंदोलन के कार्यक्रम में फिरंगियों द्वारा पिटाई से बेहोश हो गए थे, परंतु दाँत में दबे तिरंगे झंडे को नहीं छोड़ा। देशप्रेम के इतने मतवाले थे कि इनका नाम ‘मत्त जी’ ही पड़ गया । अँगरेजी सीखने की लगन के कारण जेल में ही तसले पर कोयले से लिख-लिखकर अँगरेजी भाषा सीखी । निरक्षर साथियों को साक्षर बनाया ।
आगरा जिले के लगानबंदी के आँकड़े इकट्ठे किए, जिसके लिए पं० गोविंद बल्लभ पंत जी ने उनकी बहुत प्रशंसा की । लगान माफी का आदेश पारित किया गया, जो ब्रिटिश पार्लियामेंट में प्रस्तुत किया गया था । आचार्य जी उन दिनों श्री कृष्णदत्त पालीवाल के ‘सैनिक’ अखबार के लिए बराबर लिखते रहे। इसी पत्र के माध्यम से सेनानियों के त्याग, बलिदान एवं सत्याग्रह का प्रचार-प्रसार होता था । ‘मत्त प्रलाप’ स्तंभ में आचार्य जी के गीत और लेख बराबर छपते थे । जो समाज में देशप्रेम की आग, जोश व जुनून पैदा करने का कार्य करते थे ।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
इधर युवा श्रीराम की तप-साधना चल रही थी, उधर देश में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। महात्मा गांधी के आह्नान पर युवा श्रीराम सक्रिय क्रांतिकारी की भूमिका निभा रहे थे। आँवलखेड़ा के पास जरार स्थान पर हुए सत्याग्रह आंदोलन में अँगरेज सरकार के विरोध में श्रीराम शर्मा के नेतृत्व में जलूस निकाला जा रहा था। पुलिस ने लाठी चार्ज किया। श्रीराम गिर पड़े; पुलिसवाला तिरंगा छुड़ाने लगा तो उन्होंने झंडा मुँह में दबा लिया, लेकिन छोड़ा नहीं। बेहोश हो गए। बाद में दाँतों में फँसा झंडा मुश्किल से निकाला गया। आजादी के लिए जी-जान लगाने वाले मतवाले श्रीराम को लोग ‘मत्त जी’ के नाम से पुकारने लगे। वे सचमुच आजादी के मतवाले सेनानी थे। कोलकाता (कलकत्ता) में कांग्रेस के महाधिवेशन में भाग लेने गए श्रीराम को पुलिस ने स्टेशन पर ही पहचान लिया और गिरफ्तार कर लिया।
आसनसोल की जेल पहुँचे तो वहाँ मालवीय जी, स्वरूपरानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, देवदास गांधी जैसे बड़े नेताओं से मुलाकात हुई। जेल में ही लोहे के तसले पर कोयले से अँगरेजी लिखना-पढ़ना सीखा और जेल में बंद कैदियों को पढ़ाया। आंदोलन के दौरान कई बार जेलयात्रा करनी पड़ी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन आदि सुविधाओं के लिए आवेदन ही नहीं किया। बाद में शासन-प्रशासन ने स्वत: संज्ञान लेकर उन्हें ताम्रपत्र आदि शांतिकुंज आकर भेंट किए। उन्होंने पेंशन को हरिजन फंड में दान कर दिया ।
ऊपर की पंक्तियों में आचार्यश्री का वह जीवन परिचय है, जो युग निर्माण मिशन की स्थापना से पहले का है। आचार्यश्री सन् 1940 में मथुरा आ गए और जीवन के 30 वर्ष यहीं व्यतीत हुए। जिनमें मिशन की स्थापना, गायत्री परिवार का संगठन, प्रचार-प्रसार आदि महत्त्वपूर्ण कार्य यहाँ संपन्न हुए।
‘सैनिक’ पत्र छोड़ने के पश्चात डेढ़ वर्ष का समय ‘मत्त जी’ ने स्वाध्याय एवं अपनी भावी तैयारी हेतु गहन मंथन में लगाया।