स्वाध्याय क्यों?

भावन्त:वा इमां पृथिवी वित्तेन पूर्णमद तल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं  जयति भूयां सेवाक्षम्यय एवं विद्वान अहरह स्वाध्यायमधीते। —शतपथ ब्राह्मण

अर्थात धन-धान्य से संपन्न धरती दान करने से, जितना पुण्य दाता को मिलता है, उसके तीन गुने से भी अधिक लाभ नियमित रूप से स्वाध्यायशील को मिलता है ।

स्वाध्याय योग युक्तात्मा परमात्मा प्रकाशते।—महर्षि व्यास
स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।

नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्यति तरन्ति ते।—महाभारत शांति पर्व
नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दु:खों से पार हो जाता है ।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते।—गीता 17/15
स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है ।

स्वाध्याय से बढकर आनंद कुछ नहीं। —गांधी जी

मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक 
शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाए रखने के लिए जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाए रखने के लिए उत्तमोत्तम ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य है सद्ग्रंथों के स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होकर हमारे जीवन को सरल, समुन्नत एवं सरस बना देती हैं स्वाध्याय के संबंध में कम लोग ही यह अनुभव करते हैं कि उसकी महत्ता भी सत्य और धर्म के परिपालन से किसी भी प्रकार कम नहीं है ।

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