स्वाध्याय से बढकर आनंद कुछ नहीं। —गांधी जी

वंदनीया माताजी के अनुदान

जमींदारी के बॉण्ड बेचकर मथुरा- वृंदावन रोड पर जमीन खरीदी गई, औपचारिकता पूरी करते हुए जमीन की रजिस्ट्री हो गई। जमीन तो ले ली गई, परंतु उसमें कुछ बनवाने की आवश्यकता को वंदनीया माताजी अनुभव कर रही थीं। उन्होंने कुछ देर सोचा, अंदर जाकर अपने सारे गहने जो उनके पास थे, परमपूज्य गुरुदेव के चरणों में रख दिए। दोनों ने एकदूसरे की ओर कुछ देर देखा। परमपूज्य गुरुदेव माताजी के समर्पण को समझ गए तथा चुपचाप वह निधि स्वीकार कर ली। गायत्री तपोभूमि के निर्माण में एवं गायत्री मंदिर के निर्माण में वंदनीया माताजी का अपूर्व अनुदान लगा है। वैशाख पूर्णिमा, सन् 1953 में मथुरा- वृंदावन मार्ग पर गायत्री तपोभूमि की स्थापना एवं गायत्री मंदिर का निर्माण हुआ।

उन दिनों द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरे विश्व में आर्थिक मंदी छाई हुई थी। उद्योग-धंधे ठप पड़ गए थे। प्रेस बंद हो गए थे, पहले कागज का संकट आया था, वह दूर कर लिया गया। अखण्ड ज्योति पत्रिका की छपाई में कठिनाई आने लगी। मथुरा में अधिकतर छपाई मशीनें बंद हो गई थीं। वंदनीया माताजी ने गुरुदेव से कहा—‘‘कैसे भी हो, अखण्ड ज्योति बंद नहीं होनी चाहिए। स्वयं की मशीन खरीदकर छपाई का काम करें तो कैसा रहेगा? क्योंकि यह पत्रिका कागज पर छपी किताब नहीं है। गुरुदेव यह अखंड दीपक जल रहा है, अखण्ड ज्योति उसका प्रकाश है। जैसे हम इस दीपक को निरंतर जलाए रखते हैं, वैसे ही पत्रिका निरंतर प्रकाशित होनी चाहिए।’’

कार्यालय, घर-परिवार के काम-काज की व्यस्तताएँ कितनी भी क्यों न रही हों, परंतु मातृत्व का आँचल कभी छोटा नहीं पड़ा। वे कहा करतीं थीं कि ‘‘मैं केवल सतीश या शैलो की ही माँ नहीं हूँ, मैं सब की माँ हूँ।’’ वंदनीया माताजी के सुझाव पर विचार किया और मशीन मँगाई गई। अखण्ड ज्योति संस्थान के नीचे के कमरे में एक छोटी प्रेस लगाकर छपाई आरंभ की गई, पत्रिका छपने लगी।

परमपूज्य गुरुदेव ने कहा—‘‘यह साहस माताजी ने किया है। माताजी का दुलार-स्नेह है अखण्ड ज्योति पत्रिका। कभी-कभी गुरुदेव कहा करते थे कि ये अन्य सबकी माताजी ही नहीं, हमारी भी माताजी हैं।’’ पति के कंधे-से-कंधा मिलाकर मिशन के कार्यों में जुट गईं, जैसा पति का जीवन, वैसा ही अपना जीवन। अपने इष्ट-आराध्य के साथ सन् 1971 तक अखण्ड ज्योति संस्थान-घीयामंडी व गायत्री तपोभूमि, मथुरा में सक्रिय रहने का समय रहा। दोनों ने दो शरीर एक आत्मा के रूप में जीवन को समाज के लिए समर्पित किया।

हाथ से कागज बनाना, सुखाना, फिर पैर से चलने वाली ‘ट्रेडिल मशीन’ द्वारा छोटे-छोटे ट्रैक्ट व अखण्ड ज्योति पत्रिका छापना, उन पर पते लिखकर डिस्पैच करना आदि कार्य परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी दोनों मिलकर ही सँभालते थे। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की देख-भाल की व्यवस्था वंदनीया माताजी अकेले सँभालती थीं।

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