मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक

गायत्री चालीसा

ह्रीं,    श्रीं,    क्लीं,    मेधा,      प्रभा,    जीवन  ज्योति    प्रचंड   ।

शांति,    क्रांति,    जाग्रति,    प्रगति,    रचना    शक्ति    अखंड ॥

जगत     जननि,    मंगल     करनि,      गायत्री      सुख    धाम   ।

प्रणवों      सावित्री,      स्वधा,     स्वाहा        पूरन        काम   ॥

भूर्भुव:  स्व:  ॐ युत   जननी  ।  गायत्री  नित  कलिमल   दहनी ॥

अक्षर  चौबिस  परम   पुनीता  ।  इनमें  बसें  शास्त्र   श्रुति   गीता ॥

शाश्वत   सतोगुणी    सतरूपा   । सत्य    सनातन   सुधा   अनूपा ॥

हंसारूढ़     सितंबर      धारी   । स्वर्ण  कांति  शुचि गगन विहारी ॥

पुस्तक  पुष्प  कमंडलु  माला   । शुभ्र  वर्ण  तनु  नयन   विशाला ॥

ध्यान धरत पुलकित हिय होई   । सुख  उपजत दु:ख दुरमति खोई ॥

कामधेनु  तुम  सुर  तरु  छाया   ।  निराकार   की   अद्भुत   माया ॥

तुम्हरी   शरण  गहै  जो  कोई    । तरै   सकल   संकट   सों   सोई ॥

सरस्वती  लक्ष्मी  तुम   काली   । दिपै  तुम्हारी   ज्योति   निराली ॥

तुम्हरी  महिमा  पार  न   पावैं  । जो शारद  शत मुख   गुण  गावैं ॥

चार  वेद  की   मातु   पुनीता  ।  तुम    ब्रह्माणी    गौरी     सीता ॥

महामंत्र   जितने   जग   माहीं ।  कोऊ    गायत्री     सम    नाहीं ॥

सुमिरत  हिय  में  ज्ञान प्रकासै । आलस    पाप   अविद्या   नासै ॥

सृष्टि बीज जगजननि  भवानी  । कालरात्रि    वरदा     कल्याणी ॥

ब्रह्मा  विष्णु   रुद्र   सुर   जेते   । तुम    सों    पावें    सुरता   तेते ॥

तुम  भक्तन  की  भक्त  तुम्हारे ।  जननिहिं  पुत्र   प्राण   ते   प्यारे ॥

महिमा    अपरंपार     तुम्हारी । जय  जय  जय  त्रिपदा  भयहारी ॥

पूरित  सकल   ज्ञान   विज्ञाना । तुम सम अधिक न जग में आना ॥

तुमहिं  जानि  कछु रहै न शेषा । तुमहिं पाय कछु  रहै  न  क्लेशा ॥

जानत तुमहिं  तुमहिं  ह्वै जाई । पारस   परसि   कुधातु   सुहाई  ॥

तुम्हरी  शक्ति  दिपै  सब  ठाईं । माता   तुम   सब   ठौर   समाईं  ॥

ग्रह   नक्षत्र    ब्रह्मांड    घनेरे  ।  सब    गतिवान    तुम्हारे   प्रेरे   ॥

सकल सृष्टि की प्राण  विधाता । पालक,  पोषक, नाशक,  त्राता ॥

मातेश्वरी   दया    व्रत   धारी   । तुम   सन   तरे  पातकी    भारी ॥

जापर    कृपा   तुम्हारी   होई । तापर   कृपा   करें   सब   कोई   ॥

मंद  बुद्धि  ते  बुधि  बल पावें । रोगी    रोग    रहित   ह्वै    जावें ॥

दारिद  मिटै  कटै   सब  पीरा । नाशै   दु:ख   हरै   भव      भीरा ॥

गृह  कलेश  चित  चिंता  भारी । नासै    गायत्री     भय     हारी  ॥

संतति   हीन   सुसंतति   पावें । सुख  संपत्ति  युत   मोद   मनावें ॥

भूत  पिशाच  सबै  भय  खावें । यम  के  दूत  निकट  नहिं आवें ॥

जो  सधवा  सुमिरें  चित लाई । अछत   सुहाग   सदा   सुखदाई ॥

घर वर  सुखप्रद  लहैं  कुमारी । विधवा  रहें   सत्य   व्रत   धारी ॥

जयति  जयति  जगदंब भवानी । तुम  सम  और दयालु  न दानी ॥

जो   सद्गुरु  सों  दीक्षा     पावें । सो  साधन  को  सफल   बनावें ॥

सुमिरन करें  सुरुचि  बड़भागी । लहैं    मनोरथ    गृही   विरागी  ॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता । सब    समर्थ    गायत्री    माता  ॥

ॠषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी । आरत, अर्थी,  चिंतित, भोगी ॥

जो  जो  शरण  तुम्हारी  आवैं । सो  सो  मन  वांछित  फल पावैं ॥

बल, बुद्धि, विद्या, शील, सुभाऊ । धन, वैभव, यश, तेज उछाऊ ॥

सकल  बढ़ें  उपजें  सुख नाना । जो  यह  पाठ  करै  धरि ध्याना  ॥

यह    चालीसा     भक्ति     युत,     पाठ     करै     जो    कोय   ।

तापर         कृपा         प्रसन्नता,      गायत्री     की        होय   ॥

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।

भावार्थ — उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।

 

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