स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते। अर्थात स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है । —गीता 17/15

संकल्प श्रद्धांजलि समारोह

2 जून (गायत्री जयंती) सन् 1990 परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के समय माताजी ने अपनी वेदना छिपाते हुए लाखों अश्रुपूरित बच्चों को हिम्मत बँधाई। इसके पश्चात 1 अक्टूबर से 4 अक्टूबर सन् 1990 में विराट श्रद्धांजलि समारोह में उपस्थित 05 लाख से अधिक परिजनों को माताजी ने अपनी वाणी से आश्वस्त किया। इसके पश्चात सन् 1992 में 6 से 8 जून के बीच शांतिकुंज में विराट शपथ समारोह का आयोजन किया, जिसमें लाखों लोगों ने माताजी के आह्वान पर देव संस्कृति का विस्तार करने के लिए संकल्प लिया। सन् 1992 में माताजी द्वारा अश्वमेध यज्ञों की शृंखला की घोषणा की गई। पहला यज्ञ 8 से 10 नवंबर सन् 1992 में जयपुर में हुआ। इस प्रकार 18 अश्वमेध यज्ञ माताजी के मार्गदर्शन में संपन्न हुए। माताजी के व्यक्तित्व में आदर्श गृहिणी, वात्सल्यमयी माँ, उत्कृष्ट तपस्विनी, आध्यात्मिक शक्तियों की स्रोत, ओजस्वी वक्ता एवं कुशल व्यवस्थापिका आदि कितने ही रूपों को देखा गया।

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