परमपूज्य गुरुदेव सन् 1940 में मथुरा आए और घीयामंडी में अखण्ड ज्योति संस्थान की स्थापना की। परमपूज्य गुरुदेव सीमित साधनों में अपने अखंड दीपक के साथ आगरा से आकर यहीं रहने लगे। अखण्ड ज्योति पत्रिका का नियमित प्रकाशन यहीं से क्रमश: आत्मीयता विस्तार की, जन-जन तक अपने क्रांतिकारी चिंतन के विस्तार की प्रक्रिया ‘अखण्ड ज्योति पत्रिका', जो आगरा से ही आरंभ कर दी गई थी, इसमें ‘गायत्री चर्चा’ स्तंभ व अन्यान्य लेखों की पंक्तियों के माध्यम से संपन्न होने लगी। व्यक्तिगत पत्रों द्वारा उनके अंतस्तल को स्पर्श कर एक महान स्थापना का बीजारोपण होने लगा। यही वह स्थान है, जहाँ आकर अगणित दु:खी, तनावग्रस्त व्यक्तियों ने गुरुदेव के स्पर्श से नए प्राण पाए तथा उनके व परम वंदनीया माताजी के हाथों से भोजन-प्रसाद पाकर उनके अपने होते चले गए। गायत्री-साधना का प्रचार-प्रसार यहीं से किया। सभी के लिए गायत्री-साधना सुलभ बनाने की प्रक्रिया यहीं से प्रारंभ हुई।
हाथ से बने कागज पर छोटी ट्रेडिल मशीनों द्वारा यहीं पर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका छापी जाती थी। बगल की एक छोटी-सी कोठरी में अखंड दीपक जलता था, जहाँ पूज्य आचार्य जी गायत्री महापुरश्चरण की साधना करते थे, लगभग 12 पुरश्चरण उन्होंने यहाँ ही पूरे किए। 30 वर्ष का साधनाकाल-लेखनकाल पूज्यवर का इसी घीयामंडी के भवन में छोटी-छोटी दो कोठरियों में गहन तपश्चर्या के साथ बीता। तपोभूमि निर्माण की पृष्ठभूमि यहीं बनी, सन् 1958 के सहस्रकुंडीय यज्ञ की आधारशिला यहीं रखी गई, यहीं सारी योजनाएँ बनीं एवं विधिवत् गायत्री परिवार बनता चला गया। अखण्ड ज्योति संस्थान का पुराना स्वरूप हटाकर अब वहाँ परमपूज्य गुरुदेव व परम वंदनीया माताजी की पावन स्मृति में भव्य स्मारक बनाया जा रहा है।
रोज आने वाले पत्रों को स्वयं परम वंदनीया माताजी पढ़ती जातीं एवं पूज्यवर इतनी ही देर में जवाब लिखते जाते, यही सूत्र संंबंधों के सुदृढ़ बनने का आधार बना। हर परिजन को तीन दिन में जवाब मिल जाता, शंका-समाधान हो; पत्र चला जाता। देखते-देखते एक विराट गायत्री परिवार बनता चला गया।
गायत्री महाविज्ञान के तीनों खंड जो आज संयुक्त रूप से छापा गया है, युग निर्माणपरक साहित्य, आर्षग्रंथों के भाष्य को अंतिम आकार देने का कार्य यहीं संपन्न हुआ। सहस्रकुंडीय यज्ञ पुरश्चरण पूर्ण होने पर पूर्णाहुति, यहाँ रहते ही संपन्न की गई। शांतिकुंज की स्थापना का विशिष्ट कार्य ॠषियुग्म ने यहीं रहते इसी साधनास्थली से आरंभ कर दिया था। जनसम्मेलनों, छोटे-बड़े यज्ञों एवं 1008 कुंडीय पाँच विराट यज्ञों, विदाई सम्मेलन की पूज्यवर ने यहीं से रूपरेखा बनाई। ॠषियुग्म स्थायी रूप से इस घर से सन् 1971 की 20 जून को विदा लेकर शांतिकुंज, हरिद्वार चले गए।
पुस्तकों का प्रकाशन, कठोर तपश्चर्या, ममत्व विस्तार तथा पत्रों द्वारा जन-जन के अंतस्तल को छूने की प्रक्रिया यहीं से प्रारंभ हुई। परम वंदनीया माताजी, जिन्हें भविष्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अपने आराध्य, इष्ट अपने गुरु के लिए निभानी थी, उन्होंने यहीं भावभरे आतिथ्य से सबको अपना बनाया। हर दु:खी-पीड़ित को सांत्वना देकर, ममत्वभरे परामर्श से गायत्री परिवार का आधार खड़ा किया, इसमें कोई संदेह नहीं है। विचारक्रांति के बीज इसी भूमि में ॠषियुग्म ने बोए और सींचे हैं। भावात्मक क्रांति में ॠषियुग्म के असीम स्नेह को परिजन आज भी नहीं भूल पाते हैं। गायत्री परिवार की स्थापना, गायत्री तपोभूमि की स्थापना यहीं रहते की गई।
नित्य लेखन इसी स्थान से प्रारंभ किया गया। लाखों की संख्या में अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन, विस्तार, डिस्पैच आदि का एक विराट तंत्र यहीं से संचालित हुआ। इस स्थान पर पहुँचते ही दर्शनार्थी परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी के सूक्ष्म रूप में उपस्थित होने का अनुभव करते हैं। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया, बोला गया एक-एक शब्द यहाँ से प्रकाशित 108 बड़े ग्रंथों (वाङ्मय) का प्रकाशन एवं प्रसार-वितरण यहीं से होना आरंभ हुआ ।
अखण्ड ज्योति पारमार्थिक औषधालय—पीड़ित और गरीबों की सेवा के लिए यहाँ एक औषधालय चलाया जा रहा है, जिसमें आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, एलोपैथिक, नेत्रचिकित्सा, योग-प्राणायाम, फिजियोथेरेपी आदि की व्यवस्था से हजारों परिजन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं।
संपर्क सूत्र—अखण्ड ज्योति संस्थान, बिरला मंदिर के सामने मथुरा-वृंदावन रोड, जयसिंह पुरा, मथुरा (उ० प्र०) 281003
फोन नंबर : (0565) 2403940, 2972449, 2412272-73
मोबाइल नंबर : 9927086291, 7534812036-37-38-39
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