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गायत्री तपोभूमि – युगनिर्माण योजना
स्वाध्याय से बढकर आनंद कुछ नहीं। —गांधी जी

अंतिम संदेश

अस्सी वर्ष जी गई लंबी सोद्देश्य शरीर यात्रा पूरी हुई। इस अवधि में परमात्मा को हर पल अपने हृदय और अंत:करण में प्रतिष्ठित मानकर एक-एक क्षण का पूरा उपयोग किया है। शरीर अब विद्रोह कर रहा, यों उसे कुछ दिन और घसीटा भी जा सकता है, पर जो कार्य परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता ने सौंपे हैं, वे सूक्ष्म और कारणशरीर से ही संपन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में कृशकाय शरीर से मोह का कोई औचित्य नहीं है।

‘ज्योति बुझ गई’, यह भी नहीं समझा जाना चाहिए। अब तक के जीवन में जितना कार्य स्थूलशरीर ने किया है; उससे सौ गुना सूक्ष्म अंत:करण से संभव हुआ है। आगे का लक्ष्य विराट है। संसार भर के छह अरब मनुष्यों की अंतश्चेतना को प्रभावित और प्रेरित करने, उनमें आध्यात्मिक प्रकाश और ब्रह्मवर्चस जगाने का कार्य पराशक्ति से ही संभव है। परिजन, जिन्हें हमने ममत्व के सूत्र से बाँधकर परिवार के रूप में विस्तृत रूप दे दिया है, संभवत: स्थूलनेत्रों से हमारी काया को नहीं देख पाएँगे, पर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि इस शताब्दी के अंत तक, जब तक सूक्ष्मशरीर, कारण के स्तर तक न पहुँच जाए, हम शांतिकुंज परिसर व प्रत्येक परिजन के अंत:करण में विद्यमान रहकर अपने बालकों में नवजीवन और उत्साह भरते रहेंगे। उनकी समस्या का समाधान उसी प्रकार निकलता रहेगा, जैसा कि हमारी उपस्थिति में उन्हें उपलब्ध होता।

हमारे आपसी संबंध अब और भी प्रगाढ़ हो जाएँगे; क्योंकि हम बिछड़ने के लिए नहीं जुड़े थे। हमें एक क्षण के लिए भुला पाना आत्मीय परिजनों के लिए कठिन हो जाएगा।

ब्रह्मकमल के रूप में हम तो खिल चुके, किंतु उसकी शोभा और सुगंधि के विस्तार हेतु ऐसे अगणित ब्रह्मबीज-देवमानव उत्पन्न कर जा रहे हैं, जो खिलकर समूचे संस्कृति सरोवर को सौंदर्य-सुवास से भर सकें, मानवता को निहाल कर सकें।

ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं का उत्पादन, प्रशिक्षण एवं युग निर्माण के महान कार्यों में उनका नियोजन बड़ा कार्य है। यह कार्य हमारे उत्तराधिकारियों को करना है। शक्ति हमारी काम करेगी तथा प्रचंड शक्ति-प्रवाह अगणित देवात्माओं को इस मिशन से अगले दिनों जोड़ेगा। उन्हें संरक्षण, स्नेह देने-खरादने, सँभालने का कार्य माताजी संपन्न करेंगी। हम सतयुग की वापसी के सरंजाम में जुट जाएँगे। जो भी संकल्पनाएँ नवयुग के संबंध में हमने की थीं, वे साकार होकर रहेंगी। इसी निमित्त काय पिंजर का सीमित परिसर छोड़कर हम विराट घनीभूत प्राण-ऊर्जा के रूप में विस्तृत होने जा रहे हैं।

देव समुदाय के सभी परिजनों को मेरे कोटि-कोटि आशीर्वाद, आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होने हेतु अगणित शुभकामनाएँ।

                                                                                                                                                 

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