गायत्री-उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परंतु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकांडों के साथ की गई उपासना अति फलदायी मानी गई है । तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री-उपासना की जानी चाहिए ।
उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है —
(1) ब्रह्म संध्या—यह शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है । इसके अंतर्गत छह कृत्य करने पड़ते हैं ।
(अ) पवित्रीकरण— बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लें एवं निम्नलिखित मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें ।
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा । य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं, स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्ष:, पुनातु पुण्डरीकाक्ष:, पुनातु ।
(ब) आचमन— वाणी, मन व अंत:करण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए ।
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।
ॐ सत्यं यश: श्रीर्मयि, श्री: श्रयतां स्वाहा ।
(स) शिखास्पर्श एवं वंदन— शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें —
ॐ चिदरूपिणि महामाये, दिव्यतेज: समन्विते । तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥
(द) प्राणायाम— श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राणशक्ति और श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है । छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए —
ॐ भू:, ॐ भुव:, ॐ स्व:, ॐ मह:, ॐ जन:, ॐ तप:, ॐ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् । ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुव: स्व: ॐ ।
(य) न्यास— इसका प्रयोजन है—शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंत: की चेतना को जगाना, ताकि देवपूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उसमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।
(1) ॐ वाङ्मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
(2) ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
(3) ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
(4) ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
(5) ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
(6) ॐ ऊर्वोर्मे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
(7) ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)
(र) पृथ्वीपूजन— एक चम्मच जल धरती माता पर समर्पित करते हुए उन्हें प्रणाम करें, श्रेष्ठ गुणों को धारण करने की प्रार्थना करें ।
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका, देवि! त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम् ॥
आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त छहों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो ।
(2) देवपूजन—गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है ।
(क) गुरु— सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन अग्रलिखित मंत्रोच्चार के साथ करें —
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुरेव महेश्वर: । गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम: ॥
ॐ अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नम: ॥
ॐ श्री गुरवे नम:, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।
(ख) गायत्री— गायत्री-उपासना का आधार केंद्र महाप्रज्ञा-ॠतंभरा गायत्री हैं । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की भावना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति यहाँ अवतरित, स्थापित हो रही है ।
ॐ आयातु वरदे देवि! त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि । गायत्रिच्छन्दसां मात:, ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते ।
ॐ श्री गायत्र्यै नम: । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि ।
(ग) पंचोपचार-पूजन— जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें ।
जल का अर्थ है—नम्रता-सहृदयता । अक्षत का अर्थ है—समयदान-अंशदान । पुष्प का अर्थ है—प्रसन्नता आंतरिक उल्लास । धूप-दीप का अर्थ है—सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है—स्वभाव व व्यवहार में मधुरता, शालीनता का समावेश । ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किए जाते हैं ।
(3) जप— गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला नियमित रूप से किया जाए। अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम । ओंठ हिलते रहें, किंतु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप-प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ॥
इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाए एवं भावना की जाए कि हम निरंतर पवित्र हो रहे हैं । दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है ।
(4) ध्यान— जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है । जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।
(5) सूर्यार्घ्यदानम् — जप समाप्ति के पश्चात पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है—
ॐ सूर्यदेव ! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते । अनुकम्पय मां भक्त्या, गृहाणार्घ्य दिवाकर ॥
ॐ सूर्याय नम:, आदित्याय नम:, भास्कराय नम: ॥
भावना यह करें कि जल आत्मसत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराटब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-संपदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है ।
(6) विसर्जनम्— आवाहन किए गए यज्ञ पुरुष, गायत्री माता, देव परिवार सबको भावभरी विदाई देते हुए पूजा वेदी पर पुष्पवर्षा की जाती है । पुष्पों के अभाव में पीले अक्षत बरसाए जाते हैं । विसर्जन के साथ यह प्रार्थना भी की जाती है कि ऐसा ही देव अनुग्रह बार-बार मिलता रहे ।
ॐ यान्तु देवगणा: सर्वे, पूजामादाय मामकीम् । इष्टकामसमृद्ध्यर्थं, पुनरागमनाय च ॥
इतना सब करने के बाद पूजास्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए । जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए । सूर्योदय से दो घंटे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री-उपासना की जा सकती है । मौन-मानसिक जप चौबीसों घंटे किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उँगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें ।