स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते। अर्थात स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है । —गीता 17/15

युगॠषि के लिए भावाभिव्यक्तियाँ

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डॉ० राधाकृष्णन (राष्ट्रपति) —‘‘यदि यह ज्ञान नवनीत मुझे कुछ वर्ष पूर्व मिल गया होता तो संभवत: मैं राजनीति में प्रवेश न कर आचार्यश्री के चरणों में बैठा अध्यात्म दर्शन का शिक्षण ले रहा होता।’’ (पूज्य गुरुदेव के वेदभाष्य के अवलोकन के बाद)

डॉ० शंकर दयाल शर्मा (राष्ट्रपति) — ‘‘आचार्य जी ने सिद्धांत और साधना को आधुनिक युग के अनुकूल तर्क व शब्द देकर सामाजिक परिवर्तन का जो मार्ग दिखाया है, उसके लिए आने वाली पीढ़ियाँ युगों-युगों तक कृतज्ञ रहेंगी।’’

‘‘इस दृष्टि से आचार्य जी ने अनेक छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ लिखी हैं, जो व्यावहारिक जीवन से संबंधित हैं और अत्यंत महत्त्व की हैं। मैं चाहूँगा कि ये पुस्तिकाएँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाई जाएँ, ताकि लोग उनसे अपने जीवन का निर्देशन प्राप्त कर सकें।’’ (देशमणि पुस्तक, पृष्ठ-111)

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डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम (राष्ट्रपति) — ‘‘युगॠषि श्रीराम शर्मा आचार्य वर्तमान भारत में ज्ञानक्रांति के अगुआ हैं।’’

डॉ० एम० चेन्ना रेड्डी (राज्यपाल, उत्तर प्रदेश) — ‘‘आज मैं अपने जीवन में प्रथम बार एक महान संत, तपस्वी और भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक का दर्शन कर पाया हूँ।’’

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श्री विश्वनाथ दास (राज्यपाल, उत्तर प्रदेश) — ‘‘आज मैंने, व्यक्ति में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए हैं।’’

आचार्य निरंजननाथ (अध्यक्ष, राजस्थान-विधानसभा, जयपुर) — ‘‘मैंने पाया कि उनमें (पूज्य गुरुदेव) मानव सेवा की तड़पन, साधना का प्रकाश, प्रेम का सौरभ और विरक्ति की सौम्यता बहुत ही अधिक है, उनका पांडित्य आध्यात्मिक क्षेत्र का प्रकाशस्तंभ है, गांधी जी के प्रवचनों की शालीनता, रामकृष्ण परमहंस की सहजता और नेहरू जी की निश्चिंतता का संगम उनकी अभिव्यक्ति में मिलता है।’’

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संत देवरहा बाबा — ‘‘गायत्री के सिद्ध साधक आचार्यश्री का मैं नित्यप्रति अभिनंदन करता हूँ। वे मेरे हृदय में बसते हैं।’’

महात्मा आनंद स्वामी (आर्य समाज के महान संत) — ‘‘आचार्यश्री ने गायत्री को जन-जन की बनाकर महर्षि दयानंद के कार्य को आगे बढ़ाया है। गायत्री और वे एक रूप हैं।’’

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श्री विनोबा भावे  —‘‘मैंने इस वेदभाष्य को भली प्रकार देखा है। ऐसा सुंदर भाष्य कोई सुंदर ॠषि ही कर सकता है। अन्य में भला ऐसी सामर्थ्य कहाँ? इसके भाष्यकर्त्ता को मैं वेदमूर्ति मानता हूँ।’’

माँ आनंदमयी — ‘‘एक बार गुरुजी-माताजी माँ आनंदमयी के आश्रम में पहुँचे। उन्हें देखकर माँ आनंदमयी प्रसन्नता से भर गईं और बोलीं—‘‘आइए, आइए ! माताजी-पिताजी आइए।’’ गुरुजी बोले—‘‘माँ तो आप हैं।’’ इस पर वे बंगाली भाषा में बोलीं—‘‘आमी जानी, के बाबा के माँ।’’ माँ आनंदमयी ने गुरुजी-माताजी के चरण पखारे और फिर गुरुजी-माताजी को भीतर ले गईं।’’

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स्वामी करपात्री महाराज — ‘‘आचार्य जी इस युग में गायत्री के जनक हैं। गायत्री सबकी होने के बाद लुप्त होने से बच गई।’’ (सन् 1974 हरिद्वार कुंभ)

स्वामी अखंडानंद सरस्वती — ‘‘जो गायत्री का गंगाजल की तरह सेवन करना चाहते हों, वे आचार्य जी का मार्ग अपनाएँ।’’

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स्वामी विशुद्धानंद (हिमालयवासी महान सिद्धपुरुष) ‘‘आचार्य जी आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के पारदर्शी मनीषी हैं, उन्होंने अपने को घनघोर तपस्या में तपा-तपाकर अष्टधातु का बना लिया है। आचार्य जी असंख्यों को पार करने वाले अनुभवी मल्लाह हैं, वे महान पैदा हुए हैं, महानता के साथ जी रहे हैं और उनका अंत भी महान ही होगा।’’

शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती (कांचि काम कोटि पीठ) — ‘‘आचार्य जी का एकाकी पुरुषार्थ सारे संत समाज की सम्मिलित शक्ति के स्तर का है। उन्होंने गायत्री व यज्ञ को प्रतिबंध रहित करने के निमित्त जो कुछ भी किया, वह शास्त्रों के अनुसार ही था। आचार्य जी ऐसे युगपुरुष हैं, जिनका हर कार्य शास्त्रसम्मत, विधिसम्मत माना जाना चाहिए।’’

‘‘मैं आचार्य श्रीराम शर्मा जी को प्रखर प्रतिभा, दृढ़ इच्छाशक्ति तथा प्रचंड आत्मविश्वास से संपन्न अपनी तरह का एक विशिष्ट अध्यात्मवादी चिंतक मानता हूँ।’’

‘‘मैं आचार्य जी के आध्यात्मिक व्यक्तित्व को उनके समाज-सुधारक व्यक्तित्व में पूरी तरह से घुला-मिला मानता हूँ। समाज में चरित्र के संकट को रोकने के लिए उनके उपदेश मंत्र के समान हैं, जिनकी आज बहुत आवश्यकता है।’’

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स्वामी कल्याणदेव  — ‘‘मेरा और आचार्य जी का संबंध कृष्ण और सुदामा जैसा था। लोग मथुरा-वृंदावन मंदिरों के दर्शन करने जाया करते हैं। मैं आचार्य जी के यज्ञ के दर्शनों के लिए मथुरा जाया करता था।’’

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि — ‘‘वर्ष में एक बार बुलाकर मुझे भिक्षा (भोजन) कराते थे। आचार्य जी के प्रत्येक कार्य में संयम का दर्शन होता है। उनकी महानता में उनकी संयमी जीवनचर्या का विशेष योगदान है।’’

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श्री महेंद्र सिंह मस्कीन (प्रतिष्ठित शबद कीर्तनकार, पंजाब) — ‘‘पूज्य आचार्य जी ने गुरुओं की महान परंपरा को फिर से जीवित कर दिखाया है।’’

श्री रामानंद सागर (निर्देशक-निर्माता, रामायण सीरियल) — ‘‘विचार, तप, ज्ञान के रूप में आचार्यश्री तथा क्रिया, शक्ति, भक्ति के रूप में माताजी, ॠषियों के रूप में विद्यमान हैं। मानव जाति के लिए भगवान का इससे बड़ा वरदान और क्या होगा?’’

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श्री रंगनाथ मिश्र (न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट) — पूज्य गुरुदेव के सम्मान में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया। उस समय इस समारोह में सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस श्री रंगनाथ मिश्र भी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० शंकरदयाल शर्मा के साथ शामिल हुए थे। उन्होंने कहा—‘‘शरीर छोड़ने के बाद भी पूज्य आचार्य जी एक बार मुझे मार्गदर्शन दे गए।’’

श्री जुगल किशोर बिड़ला — ‘‘मैंने पंडित जी में साक्षात् ब्राह्मण के दर्शन किए हैं। उनका कोई कार्य कभी रुक नहीं सकता, क्योंकि स्वयं भगवान उनमें समाये हुए हैं।’’    

             

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श्री मोतीलाल वोरा (राज्यपाल, उत्तर प्रदेश) — ‘‘गायत्री परिवार अराजनैतिक आंदोलन है। यह ऐसा समानांतर तंत्र है, जो शासन की बगैर सहायता के भी सब कुछ कर सकने में समर्थ है। अध्यात्म के अनछुए पहलुओं को तर्क की कसौटी पर कसने के बाद गायत्री परिवार ने जिस वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को स्थापित किया है, उसके सामने आज देश ही नहीं, बल्कि विदेश भी नत-मस्तक होता जा रहा है।’’ (नवंबर, 1995 में आँवलखेड़ा, आगरा में)

               

 

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