'युग निर्माण योजना’ नवनिर्माण की अभिनव महत्त्वपूर्ण योजना है, जिसकी संकल्पना परमपूज्य पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी के द्वारा मथुरा में आयोजित सन् 1958 के सहस्रकुंडीय गायत्री महायज्ञ के समय की गई थी।
व्यक्ति-निर्माण, परिवार-निर्माण, समाज-निर्माण का लक्ष्य लेकर यह अभियान वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सन् 1962 में गायत्री तपोभूमि, मथुरा से आरंभ किया । स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज की अभिनव रचना का लक्ष्य पूरा करने के लिए विगत कई दशकों से संचालित यह आंदोलन पूरे संसार में चलाया जा रहा है।
नवनिर्माण का यह अभियान समय की एक अत्यंत आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण पुकार है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के लिए यह योजना अपनाए जाने योग्य है। व्यक्ति के परिवर्तन से ही समाज, विश्व एवं युग का परिवर्तन संभव है।
युग निर्माण योजना सतत रूप से जन कल्याण के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही है। स्थापना काल 1963 से लेकर आज तक (2024) 60 वर्षों में जनहित के अनेकों अभियानों-कार्यक्रमों को जन्म देते हुए उन्हें प्रौढ़ता के स्तर तक पहुँचाया है। 1968-69 में अध्यात्म के विज्ञानसम्मत स्वरूप की दिशा में उल्लेखनीय कार्य आरंभ हुआ। 10 वर्ष बाद 1979 में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना कर उद्देश्य की प्राप्ति के लिए द्रुत गति से कार्य चलाया जा रहा है। विश्वव्यापी ज्ञानक्रांति की व्यवस्था बनाना, देव संस्कृति दिग्विजय अभियान चलाना, संस्कारों, पर्वों- त्योहारों को प्रेरणाप्रद रूप देना, निर्मल गंगा अभियान, वृक्ष गंगा अभियान, बाल संस्कार शालाएँ, भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, गर्भोत्सव संस्कार द्वारा नई पीढ़ी का अभिनव निर्माण, नशा-निर्मूलन का प्रचंड प्रयास, आदर्श ग्राम योजना, आदर्श युवा निर्माण, नारी जागरण का दिव्य अभियान, योग, आयुर्वेद, स्वास्थ्य, शिक्षा, साधना, स्वावलंबन के बहुविधि प्रयास-पुरुषार्थ आदि बहुत सारे उपक्रम, नवनिर्माण के उद्देश्य को ही पूरा करने में तत्पर हैं।
युग निर्माण का उद्देश्य व्यक्ति, परिवार एवं समाज की ऐसी अभिनव रचना करना है, जिसमें मानवीय आदर्शों का अनुकरण करते हुए सब लोग प्रगति, समृद्धि और शांति की ओर अग्रसर हों। इसी को दूसरे शब्दों में ‘मनुष्य में देवत्व का उदय’ एवं ‘धरती पर स्वर्ग का अवतरण’ कह सकते हैं। इसे क्रियान्वित करने हेतु विशिष्ट वैचारिक, आध्यात्मिक सूत्रों की रचना की गई है, जिसे युग निर्माण सत्संकल्प के रूप में सन् 1963 में अभिव्यक्त किया गया जिसे 1989 में संशोधित किया गया। आचार्य जी ने स्वयं छोटे-बड़े जनसम्मेलनों के द्वारा विचारक्रांति की पृष्ठभूमि बनाई। 6 जुलाई, 1963 गुरु पूर्णिमा को युगनिर्माण मिशन की विधिवत् घोषणा हुई|
इस युग में नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक क्रांति द्वारा सतयुगी वातावरण उत्पन्न करने का प्रबल प्रयास इस आंदोलन द्वारा किया जा रहा है । ‘हम बदलेंगे—युग बदलेगा’ ‘हम सुधरेंगे—युग सुधरेगा’ यह इस आंदोलन की ध्रुव मान्यता है युग-परिवर्तन का आधार व्यक्ति-परिवर्तन है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक जीवन में उत्कृष्टता लाने का प्रचंड पुरुषार्थ युग निर्माण योजना के कार्यक्रमों द्वारा किया जा रहा है।
जनमानस के परिष्कार एवं वैचारिक उत्कर्ष हेतु हजारों ग्रंथों का प्रकाशन किया गया है। आंदोलन की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने हेतु कई भाषाओं में नियमित प्रकाशन तथा प्रकाशित सामग्री को लोगों तक पहुँचाने हेतु पत्रिका सदस्य बनाने, झोला पुस्तकालय, ज्ञानरथ, स्टीकर आंदोलन, ज्ञान मंदिर, पुस्तक मेला, बिक्री केंद्र आदि अनेक तरह के उपाय किए जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि पूज्य आचार्य जी द्वारा रचित सभी पुस्तकें देश-विदेश के पाठकों को उनकी भाषा में प्रकाशित कर उपलब्ध कराई जाएँ। पुस्तक मेलों ने इस साहित्य के प्रति जो भूख जगाई है, उसकी आपूर्ति के लिए बिरला मंदिर, मथुरा के बगल में एक नया प्रेस प्रारंभ किया जा चुका है।
युग निर्माण योजना से जुड़े लाखों परिजन नियमित रूप से एक घंटा समयदान एवं दो रुपया प्रतिदिन अंशदान करते हुए संस्था के कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। समयदानी, जीवनदानी प्राणवान परिजन ही इस योजना के आधारस्तंभ हैं तथा प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रमों को सफल बनाने में लगे हैं । देश, धर्म, समाज, संस्कृति, राष्ट्र एवं विश्व के उत्थान एवं कल्याण के लिए सप्त आंदोलन (साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वावलंबन, नारी जागरण, पर्यावरण, दुर्व्यसन-कुरीति उन्मूलन) जैसे अनेक कार्यक्रमों का सफल संचालन हो रहा है । घीयामंडी, मथुरा में अखण्ड ज्योति पारमार्थिक औषधालय खोला गया है, जिससे यहाँ के नागरिक लाभ ले रहे हैं । गायत्री तपोभूमि स्थित पं० श्रीराम शर्मा आचार्य पारमार्थिक चिकित्सालय द्वारा प्रत्येक पितृपक्ष में हजारों रोगियों की नि:शुल्क चिकित्सा की जाती है, जिसकी लोगों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
युग निर्माण योजना के प्रमुख संस्थानों, प्रतिष्ठानों पूज्यवर की जन्मस्थली आँवलखेड़ा आगरा, अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा, गायत्री तपोभूमि मथुरा, शांतिकुंज हरिद्वार, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्वार, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार आदि के अतिरिक्त देश एवं विदेशों में फैले हजारों केंद्र ऐसे हैं, जिन्हें चरणपीठ, शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ, ज्ञानमंदिर, युग चेतना केंद्र आदि के रूप में जाना जाता है, जहाँ से लोक-कल्याण की दिशा में अनगिनत कार्य संपन्न होते हैं ।
संसार में एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा, एक शासन की स्थापना को महत्त्वपूर्ण मानकर कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना, युग निर्माण योजना ने अपना ध्येय रखा है । योजना के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगॠषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:' 'सर्वे सन्तु निरामया:' के लक्ष्य को अपना जीवनलक्ष्य माना तथा उन्होंने ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के लिए ही अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। उन्हीं के पदचिह्नों पर चलने का सत्प्रयास उनके अनुयायी सदैव करते रहते हैं ।
धर्मतंत्र को लोक-शिक्षण का माध्यम बनाते हुए गायत्री-उपासना, यज्ञ, संस्कार, पर्व-त्योहार आदि के द्वारा विवेकपूर्ण विचारधारा जनमानस के लिए प्रस्तुत की जाती रहती है । अध्यात्म के विज्ञानसम्मत स्वरूप को ही यहाँ मान्यता मिली है तथा संस्कृति, सभ्यता के उत्कृष्ट स्वरूप को जीवन जीने की कला के रूप में अपनाया गया है । समाज में फैली दुष्प्रवृत्तियों, अंधविश्वासों, कुरीतियों, मूढ़मान्यताओं, कुप्रचलनों एवं दुर्व्यसनो को मिटाने में बड़ी सफलता मिली है । सत्प्रवृत्तियों की स्थापना, परिष्कृत धर्मधारणा, आस्तिकता, कर्त्तव्यपरायणता की प्रतिष्ठापना में भी यह आंदोलन सफल रहा है । आशा है, विचारशील जनसमुदाय इससे जुड़ता हुआ इसे लक्ष्यप्राप्ति तक अग्रसर करने में सफल होगा ।
युग निर्माण योजना का लक्ष्य मानव में देवत्व का उदय, धरती पर स्वर्ग का अवतरण अब असंभव नहीं लगता । महाकाल से प्रेरित दिव्य ईश्वरीय संरक्षण में यह अपने लक्ष्य को सुनिश्चित रूप से प्राप्त करेगी, समझदारों का ऐसा ही विश्वास है।