स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते। अर्थात स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है । —गीता 17/15

गायत्री तपोभूमि, मथुरा

आगंतुक परिजन पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी से  मिलने तथा भोजन करने अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी, मथुरा वाले मकान में जाते थे। आगंतुकों की बढ़ती भीड़ देखकर अब एक ऐसे सुसंस्कारित स्थान की आवश्यकता अनुभव हो रही थी, जहाँ वे अपने महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कर सकें तथा साथ ही सामूहिक साधना शिक्षण व संगठन के उद्देश्य को भी पूरा कर सकें। इसी पृष्ठभूमि में गायत्री तपोभूमि का जन्म हुआ। मथुरा में वृंदावन रोड पर जो दुर्वासा ॠषि की तपस्थली रही थी, ऐसे स्थान को चुना गया।

गायत्री तपोभूमि परमपूज्य गुरुदेव की चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति पर सन् 1953 में की गई स्थापना है। इस संस्थान का निर्माण गायत्री परिवाररूपी संगठन के विस्तार के लिए किया गया था। इसकी स्थापना से पूर्व चौबीस सौ तीर्थों के जल व रज को संगृहीत करके यहाँ उनका पूजन किया गया।

पूज्य गुरुदेव की साधनास्थली व प्रात:काल की लेखन-साधना की कोठरी यदि अखण्ड ज्योति संस्थान में थी, तो उनकी जन-जन से मिलने, साधनाओं द्वारा मार्गदर्शन देने की कर्मभूमि गायत्री तपोभूमि थी।

मंदिरों एवं आश्रमों को दैवी प्रवृत्तियों के प्रसारण केंद्र के नाते महत्त्व दिया जाता रहा है। गायत्री तपोभूमि की स्थापना इसी पुण्यपरंपरा को पुनर्जीवित तथा व्यावहारिक बनाने के महान उद्देश्य से की गई है। प्राण-ऊर्जा को दिव्य वातावरण में उभारने के लिए पूज्यवर ने 24 वर्ष कठोर तप किया। श्यामा गाय को जौ खिलाकर उसके गोबर से निकले हुए जौ को साफ किया जाता, उसकी 2 रोटी बनाकर छाछ के साथ सेवन किया करते थे, इस प्रकार चौबीस-चौबीस लक्ष गायत्री महामंत्र जप के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण संपन्न किए हैं। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने 30.5.1953 से 22.6.1953 तक उपवास (मात्र गंगाजल लेकर) किया तथा वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता गायत्री की स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा गायत्री तपोभूमि में की।

उनके गुरुदेव ने इस महान अभियान को गति देने हेतु दो अमूल्य रत्न (वस्तु) उन्हें प्रदान किए। जिसमें अखंड दीप तथा अखंड अग्नि का प्रमुख स्थान है। जब तक पूज्यवर मथुरा में रहे, यह अखंड दीप घीयामंडी में जलता रहा। अब शांतिकुंज में प्रज्वलित है तथा अखंड अग्नि गायत्री तपोभूमि की यज्ञशाला में संरक्षित है। गायत्री तपोभूमि में सतत अखंड दीप प्रज्वलित है। 

तपोभूमि में 108 कुंडीय गायत्री महायज्ञ संपन्न हुआ, जिसमें जून, सन् 1953 में पहली बार पूज्यवर ने साधकों को मंत्र-दीक्षा दी। यहीं पर सन् 1956 में नरमेध यज्ञ तथा सन् 1958 में विराट सहस्रकुंडीय यज्ञायोजन संपन्न हुए। श्रेष्ठ नर-रत्नों का चयन कर, व्यक्तिगत मार्गदर्शन द्वारा गायत्री परिवार का सूत्रपात हुआ।

वसंत पंचमी सन् 1955 से 15 माह तक निरंतर इस यज्ञशाला में गायत्री महायज्ञ के साथ-साथ विशेष सरस्वती यज्ञ, रुद्र यज्ञ, महामृत्युंजय यज्ञ, विष्णु यज्ञ, शतचंडी यज्ञ, नवग्रह यज्ञ, चारों वेदों के मंत्र यज्ञ, ज्योतिष्टोम, अग्निष्टोम आदि यज्ञ एक-एक माह तक होते रहे। इन यज्ञों की पूर्णाहुति 20-4-1956 से 24-4-1956 तक नवरात्र के समय चल रहे 108 कुंडीय (नरमेध यज्ञ) महायज्ञ से हुई। इसमें 5-6 हजार व्यक्तियों द्वारा 125 लाख आहुतियाँ दी गईं तथा पूर्णरूप से लोक-मंगल के लिए जीवनदानियों की शृंखला इसी महायज्ञ से आरंभ हुई। इसी अवसर पर गुरुदेव-माताजी द्वारा जेवर, पुस्तक, प्रेस, जमीन आदि भौतिक पदार्थ गायत्री माता को दान किए गए।

23-11-1958 से 26-11-1958 तक इस युग के महानतम सहस्रकुंडीय गायत्री यज्ञ का संपादन हुआ, जिसमें 5 लाख व्यक्तियों ने भाग लिया। 24 लाख गायत्री मंत्र की आहुतियाँ दी गईं, सवा करोड़ गायत्री मंत्र लेखन, 24 करोड़ गायत्री मंत्र जप एवं सवा लाख गायत्री चालीसा पाठ किए गए।

हिमालय प्रवास से लौटकर पूज्य आचार्यश्री ने युग निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम एवं सत्संकल्प की तथा गायत्री तपोभूमि, मथुरा में युग निर्माण विद्यालय—एक स्वावलंबनप्रधान शिक्षा देने वाले तंत्र के आरंभ होने की घोषणा की। यह विधिवत् सन् 1967 से आरंभ किया गया।

सन् 1971 में पूरे भारतवर्ष में पाँच सहस्रकुंडीय यज्ञ संपन्न हुए, जिनका संचालन इसी सिद्धपीठ के द्वारा किया गया। बहराइच (उ०प्र०), महासमुंद (म०प्र०), पोरबंदर (गुजरात), भीलवाड़ा (राजस्थान), टाटानगर (बिहार) में यज्ञ संपन्न हुए। इसके बाद ही यहाँ से भारतीय संस्कृति के उत्थान एवं धर्म-प्रचार के लिए साधकों को प्रशिक्षण देकर देश के कोने-कोने में भेजा गया। 

20 जून 1971 को पूज्य गुरुदेव एवं माता भगवती देवी शर्मा मथुरा से विदा होकर शांतिकुंज हरिद्वार प्रस्थान कर गए । गायत्री तपोभूमि की जिम्मेदारी यहाँ के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को सौंप गए ।

पूज्य गुरुदेव की कृपा एवं उनके दिव्य संरक्षण से गायत्री तपोभूमि का कार्य निरंतर आगे बढ़ता चला गया । पत्रिकाओं का अन्य भाषाओं में प्रकाशन शुरू हुआ । युग निर्माण योजना कई वर्षों तक मासिक के साथ-साथ पाक्षिक तथा साप्ताहिक भी प्रकाशित होती रही। युग शक्ति गायत्री (हिंदी) व प्रज्ञा अभियान आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन कुछ वर्षों तक हुआ । युग शक्ति गायत्री (गुजराती) का प्रकाशन यहाँ से निरंतर हो रहा है ।

प्रज्ञानगर का निर्माण - जब गायत्री तपोभूमि का कार्य अतिशय रूप से बढ़ने लगा तब तपोभूमि से सटी  दक्षिण साइड की जमीन जो तपोभूमि से लगभग दुगनी थी, उसे खरीदा गया और वहाँ पर प्रज्ञानगर की बसावट हुई । जिसमें तीन प्रमुख भवन- गायत्री, भगवती एवं दुर्वासा बनाए गए। भवनों के निर्माण के साथ पूज्य गुरुदेव के विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु अनेकों कार्यक्रम यहाँ  से चलाए गए ।

ज्ञानरथों का देशव्यापी भ्रमण - गायत्री तपोभूमि से पूज्य गुरुदेव के साहित्य को लेकर कई बड़े-बड़े ज्ञानरथ (जिनमें टाटा 407 और अन्य वाहनों के रूप में) देश के उत्तरी भाग के लगभग सभी प्रांतों में प्रतिवर्ष जाते थे, जिनसे साहित्य-प्रसार विक्रय का कार्य बड़े पैमाने पर हुआ करता था।

परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद उनकी लिखी 1940 से 1960 के बीच की चयनित 100 से अधिक पुस्तकों का पुनः प्रकाशन कर श्रद्धांजलि साहित्य सेट परिजनों को उपलब्ध कराया गया । यह साहित्य श्रद्धांजलि समारोह (1 से 4 अक्टूबर) 1990 में उपलब्ध रहा।

सन् 1997 में गायत्री तपोभूमि परिसर में प्रखर प्रज्ञा- सजल श्रद्धा पावन प्रतीकों की स्थापना हुई।

सन्  2002 में गायत्री तपोभूमि का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया गया। गायत्री मंदिर परिसर में परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीया माताजी की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। 2002 के बाद प्रगति क्रम बहुत तेजी से चला। बिरला मंदिर के पास जमीन लेकर चार मंजिला भवन बनाया गया। जहाँ आज युग निर्माण विस्तार का कार्य हो रहा है। कीमती प्रेस मशीनें लगाई गईंं, प्रकाशनतंत्र-व्यवस्था बड़े रूप से वहाँ हुई । हवन सामग्री निर्माण का आधुनिक विकसित तंत्र खड़ा किया गया।

सन्  2011 में गायत्री तपोभूमि में भी पूज्य गुरुदेव के जन्म शताब्दी समारोह को बड़े धूमधाम से संपन्न किया गया। 1971 के बाद यह सबसे बड़ा आयोजन था, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने उन्हें अपनी भाव पुष्पांजलि अर्पित की।

सन्  2012 में माता भगवती गोशाला की स्थापना हुई । 2021 में प्राकृतिक चिकित्सालय का भी संचालन होने लगा। आज देश के कोने-कोने से लोग यहाँ प्राकृतिक चिकित्सा शिविर का लाभ लेने आते हैं।

तपोभूमि में तीन मंजिला भवन बनाकर विशाल भोजनालय, सभागार एवं आवासीय व्यवस्था को मूर्तरूप दिया गया।

गायत्री मंदिर के सामने बाईं ओर विशाल साहित्य केंद्र तथा दाईं ओर  कार्यालय भवन सुशोभित है, जिनके द्वारा ज्ञानयज्ञ अभियान को गति देने का कार्य प्रखरता से चल रहा है।

गायत्री तपोभूमि की प्रगति यात्रा के वर्तमान दौर में पुनर्निमित गायत्री मंदिर तथा आस-पास के परिसरों का निर्माण कार्य प्रगति पर है, जो वंदनीया माताजी के शताब्दी समारोह तक परिजनों के भावपूर्ण सहयोग से पूरा कर लिया जाना है।

गायत्री तपोभूमि के बारे में पूज्य गुरुदेव बड़े ही आत्मगौरव के साथ, मई, सन् 1958,पृष्ठ 38 में लिखते हैं - गायत्री तपोभूमि विशेष उद्देश्‍यों के लिए बनाई गई है, यहाँ निवास करने वाले निरंतर धर्म की सेवा में लगे रहते हैं। तपोभूमि की इमारत अनेकों आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का केंद्र बनी रहती है । अपने आदर्शवाद के कारण ही गायत्री तपोभूमि में बड़े-बड़े कार्य किए गए हैं, जिन्हें देखकर लोग आश्चर्य करते हैं । गायत्री तपोभूमि देवालयों-तीर्थस्थानों के लिए आदर्श मॉडल-मानक की तरह है । जिसका अनुकरण हमारे देश के लाखों धर्मकेंद्र कर सकते हैं ।

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