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वंदनीया माताजी सच्चे अर्थों में अपने आराध्य की साधना-संगिनी थीं। परमपूज्य गुरुदेव उनके लिए गुरु, मार्गदर्शक, इष्ट, आराध्य सभी कुछ थे। आगंतुकों के लिए व्यवस्था बनाना, मार्गदर्शन देना, पत्रों के जवाब देना, पत्रिका संपादन व अन्य साहित्य प्रकाशन तथा गायत्री तपोभूमि के अनेक क्रियाकलापों में बराबर की सहभागी रहीं। परमपूज्य गुरुदेव ने एक स्थान पर लिखा है—मिशन को बढ़ाने में माताजी ने हमारे दाएँ-बाएँ हाथ की तरह नहीं, हृदय की भूमिका निभाई है।
परमपूज्य गुरुदेव के बारे में, उनके दिव्य स्वरूप के बारे में मुखर होकर बखान करने वाली माताजी अपने बारे में सदा मौन ही रहती थीं। ॠषियुग्म के क्रियाकलापों को देखकर भावनानुमतियों में शिव और शक्ति के अंतर्मिलन का सत्य उजागर हो ही जाता था।
सूत्र-संचालिका के रूप में वंदनीया माताजी यद्यपि अपने शांतिकुंज आगमन के समय से ही क्रियाशील थीं। उन्होंने अपने गुरु-मार्गदर्शक और आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पित साधिका का आदर्श प्रस्तुत करके दिखाया। परमपूज्य गुरुदेव माताजी को आरंभ से ही अकेले शांतिकुंज ही नहीं, संपूर्ण मिशन के सूत्र-संचालन के लिए प्रशिक्षित एवं प्रोत्साहित करते रहते थे। सन् 1984 की रामनवमी से एक योजनाबद्ध रीति से गुरुदेव के एकांत में चले जाने के बाद, मिशन के सूत्र-संचालन का सारा दायित्व माताजी पर आ गया। इसके साथ ही इस स्थिति में पूज्य गुरुदेव की स्थूलदेह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए एक समर्थ शक्ति का स्थूलरूप से दिव्य संरक्षण आवश्यक था; यह कार्य भी माताजी ने किया। माताजी पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी। मिशन के सभी कार्यों की देख-भाल करनी थी, सभी तरह की व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन देना होता था। क्षेत्रों में कार्यरत कार्यकर्त्ताओं की समस्याओं के हल निकालने होते थे। सभी बच्चों के कष्ट की ओर ध्यान रखना होता था। प्रथम बार सन् 1984 में माताजी को टोलियों की विदाई के समय प्रवचन मंच पर बोलते सुना तो सभी विस्मय-विमुग्ध तथा उल्लास से सराबोर हो उठे। उस समय सभी को माताजी की योगशक्ति का आभास मिल गया था। समस्त सूत्र-संचालन में उनका मातृत्व-सा छा गया था। वे अपने आँचल से आशीषों की वर्षा करती लग रही थीं। गुरुदेव से जब परिजन नहीं मिल पाते तो मन मसोस कर रह जाते, परंतु माताजी के प्यार भरे आशीषों से सबकी हँसी लौट आती थी। इस समय की अनेक घटनाएँ व संस्मरण शांतिकुंज व युग निर्माण मिशन के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों पर टँके हैं। एक अन्य स्थान पर परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं—‘‘वह भावमयी हैं, प्यार तो जैसे उनके रोम-रोम में बहता है। उन्हें हमारी तरह बातें बनाना तो नहीं आता, पर ममत्व लुटाने में वे हमसे बहुत आगे हैं।’’ एक विशिष्ट समय की चर्चा में गुरुदेव ने कहा—‘‘माताजी, माँ के पेट से, माताजी होकर ही पैदा हुई हैं। वे एक साथ सबकी माँ हैं।’’ अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए कहा—‘‘यह शरीर भी अब तक उन्हीं की देख-भाल पर टिका हुआ है। मेरे जीवन के सारे जटिल प्रयोग उन्हीं के मातृत्व के संरक्षण के बल पर संभव हुए हैं। सूक्ष्मीकरण की सफलता भी उन्हीं के दिव्य संरक्षण का नतीजा है।’’
वंदनीया माताजी को भली भाँति मालूम था कि सत्य के मूर्तिमान स्वरूप गुरुदेव के संकल्प व योजनाएँ कभी मिथ्या नहीं हो सकतीं। अपने द्वारा निश्चित की गई तिथि एवं निर्धारित समय के अनुसार गायत्री जयंती 2 जून, सन् 1990 को प्रात: 8 बजे के लगभग गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया, उनकी अंतश्चेतना महाशक्ति में लीन हो गई। उसी समय से वंदनीया माताजी एक अविचल भाव से अपने प्रभु से हुए भौतिक वियोग को सहते हुए महातप के लिए प्रवृत्त हो गईं।
यह ऐसा समय था, जब वंदनीया माताजी को स्वयं को सँभालने के साथ, अपनी अगणित शिष्य-संतानों को भी सँभालना था। उन्होंने कहा—‘‘प्रेम बहुत बड़ी चीज है, पर उससे भी बड़ी चीज है—कर्त्तव्य।’’ जिससे हम प्यार करते हैं, जिसके प्रति हमारी गहरी श्रद्धा है, उसके आदेश को मानकर, उसके वियोग की पीड़ा को सहते हुए यदि हम उसके द्वारा बताए कर्त्तव्य का सतत पालन करते हैं तो यह महातप है। यह माताजी द्वारा बताई उस समय विह्वल हृदय से की गई महातप की व्याख्या थी।
अंतिम प्रणाम चल रहा था। माताजी धीरे से उठीं, उन्होंने गुरुदेव के माथे पर तिलक लगाया और चरणों में प्रणाम करते हुए धीमे से, किंतु दृढ़ शब्दों में कहा—‘‘हे प्रभु! मैं अपनी अंतिम साँस तक सभी कुछ सहकर आपके काम को करती रहूँगी। आपके आदेश का पालन करूँगी।’’
वंदनीया माताजी ने 1992 जून में शपथ संकल्प समारोह आयोजित कर देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की आधारशिला रखी। इसी के अंतर्गत आश्वमेधिक यज्ञ आयोजन शृंखला आरंभ हुई, जो आज तक चल रही है। प्रथम अश्वमेध यज्ञ का आयोजन जयपुर राजस्थान में 7 से 10 नवंबर, 1992 के बीच हुआ उसके बाद माताजी के जीवनकाल में संपन्न हुए अश्वमेध यज्ञों का विवरण निम्नलिखित है –
1. जयपुर (राजस्थान) में 7 से 10 नवंबर, 1992
2. भिलाई (मध्य प्रदेश) 17 से 20 फरवरी, 1993
3. गुना (मध्य प्रदेश) 3 से 6 अप्रैल, 1993
4. भुवनेश्वर (उड़ीसा) 3 से 6 मई, 1993
5. लेस्टर (यू.के.) 8 से 11 जुलाई, 1993
6. टोरंटो (कनाडा) 23 से 25 जुलाई, 1993
7. लॉस एंजेलिस (यू.एस.ए) 19 से 22 अगस्त, 1993
8. लखनऊ (उत्तर प्रदेश) 27 से 30 अक्टूबर, 1993
9. बड़ौदा (गुजरात) 26 से 29 नवंबर, 1993
10. भोपाल (मध्य प्रदेश) 11 से 14 दिसंबर, 1993
11. नागपुर (महाराष्ट्र) 6 से 9 जनवरी, 1994
12. ब्रह्मपुर (उड़ीसा) 26 से 29 जनवरी, 1994
13. कोरबा (मध्य प्रदेश) 6 से 9 फरवरी, 1994
14. पटना (बिहार) 23 से 26 फरवरी, 1994
15. कुरुक्षेत्र (हरियाणा) 31 मार्च से 3 अप्रैल, 1994
16. चित्रकूट (उत्तर प्रदेश) 16 से 20 अप्रैल, 1994
17. भिंड (मध्य प्रदेश) 3 से 5 मई, 1994
18. शिमला (हिमाचल प्रदेश) 22 से 25 मई, 1994
इनमें भिण्ड एवं शिमला अंतिम दो अश्वमेधों को छोड़कर सभी में वंदनीया माताजी गईं।, उनके ही नेतृत्व में ये आयोजन संपन्न हुए । उनके शरीर छोड़ने के बाद भी अश्वमेधों की शृंखला अनवरत गतिशील है, जो अब 42 के ऊपर पहुँच चुकी है।