मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक

यज्ञशाला

एक छोटी, किंतु भव्य यज्ञशाला में हिमालय के महान सिद्धयोगी की धूनी से 800 वर्ष पुरानी अखंड अग्नि सन् 1953 में स्थापित की गई तथा गायत्री महाशक्ति का मंदिर विनिर्मित किया गया। 2400 तीर्थों का जल-रज एवं चौबीस सौ करोड़ गायत्री मंत्रों का लेखन, जो श्रद्धापूर्वक नैष्ठिक साधकों द्वारा किया गया, यहाँ संरक्षित रखा गया है।

गायत्री को सद्विचार और यज्ञ को सत्कर्म का प्रतीक मानते  हैं ।  यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमंडल में फैलाए जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्य रोग-कीटाणु सहज ही नष्ट हो जाते हैं ।

गायत्री तपोभूमि में प्रतिदिन यज्ञ प्रातः 06:30 बजे से आरंभ हो जाता है, जो सामान्यतः 08:30 बजे तक चलता है । यज्ञ में कोई भी याजक बिना किसी भेद-भाव के भाग ले सकता है। यज्ञ के समय भारतीय वेशभूषा (धोती, महिलाओं के लिए साड़ी, सलवार) का होना अनिवार्य है। यज्ञ पूर्णतः निशुल्क है।

 

वर्तमान में यज्ञशाला एवं मंदिर को भव्य एवं विशाल आकार दिया गया है |

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