नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्यति तरन्ति ते। अर्थात- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दु:खों से पार हो जाता है। —महाभारत शांति पर्व

युगसाहित्य सृजन एवं प्रकाशन

धर्म-अध्यात्म, गायत्री महाविद्या, जीवन जीने की कला, समग्र आरोग्य, व्यक्ति, परिवार व समाज निर्माण तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद आदि अनेक विषयों पर उन्होंने हजारों पुस्तकें लिखी हैं। पुराणों की शृंखला में परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञा पुराण की कई खंडों में रचना की।

सन् 1988 से सन् 1990 के बीच अतिमहत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी साहित्य लिखा, जिसे क्रांतिधर्मी साहित्य कहा जाता है । नियमित पढ़ना व पत्रिकाओं तथा पुस्तकों के लिए लिखना उनकी दिनचर्या के अंग थे, जिसमें कभी व्यतिक्रम नहीं हुआ। स्वाध्याय द्वारा जो पढ़ा, दैवी सत्ता ने जो ज्ञान उन्हें दिया, उसे वे बहुमूल्य विचारों के रूप में तथा सशक्त संजीवनी के रूप में लिपिबद्ध करते गए । लिखते समय कोई संदर्भ ग्रंथ सामने नहीं रखा। मानव जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं बचा, जिस पर आचार्य जी की लेखनी न चली हो । ऐसे युगपुरुष को हर संस्कृति प्रेमी नमन करने हेतु सहज श्रद्धाभाव से प्रेरित हो जाता है । अपने ब्राह्मणत्व का लाभ स्वयं तो उठाया ही और सभी को बाँटा । किसी प्रकार का अहंकार नहीं, कहीं गायत्री के सिद्ध उपासक होने का गरूर नहीं, सब कुछ स्पष्ट सीधा-सादा उनके जीवन का पक्ष, जो साधारण दृष्टि से देखा नहीं जा सकता ।

एक काया के रहते हुए उन्होंने लेखन का ऐसा महत्त्वपूर्ण कार्य किया कि अपने वजन की तौल से दोगुना लिखकर गए हैं। नियमित पढ़ना व पत्रिका तथा पुस्तकों के लिए लिखना, जिसमें कभी व्यतिक्रम नहीं हुआ। प्रतिदिन स्वाध्याय द्वारा जो पढ़ा, दैवी सत्ता ने जो ज्ञान उन्हें दिया, उसे वे बहुमूल्य विचारों के रूप में तथा सशक्त संजीवनी के रूप में लिपिबद्ध करते गए। लिखते समय कभी संदर्भ ग्रंथ सामने नहीं रखते थे। मानव जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं बचा, जिस पर उन्होंने साहित्य न लिखा हो। अपने समय में वे इतना कुछ लिखकर रख गए हैं कि आने वाले कई वर्षों तक पत्रिकाएँ सतत प्रकाशित होती रहेंगी। गुरुदेव की लेखनी दो तरह से चली—एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श दूसरा लेखों के रूप में, जिनमें व्यक्तिगत, परिवार व समाज से जुड़ी समस्याओं का अध्यात्म परिप्रेक्ष्य से समाधान समाहित रहता था।

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