मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक

गुरुदेव के महाप्रयाण के उपरांत : चार वर्ष

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी दोनों एक ही थे। परमपूज्य गुरुदेव के स्थूलशरीर छोड़ने के बाद उनकी प्रत्यक्ष जिम्मेदारियाँ वंदनीया माताजी के कंधों पर आ गईं। माताजी ने गुरुदेव की कमी का एहसास कभी नहीं होने दिया। उनमें गुरुदेव की समस्त शक्तियाँ प्रारंभ से ही विद्यमान थीं, परंतु गुरुदेव के रहते तक उन्होंने इसका खास एहसास नहीं होने दिया।

स्वयं को उनकी ओट में छिपाए रखा। गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन होने के पश्चात तो वे स्पष्ट रूप से सामने आईं और परिजनों को एहसास कराया कि वे गुरुदेव से भिन्न नहीं हैं। अर्द्ध - नारीश्वर की तरह वे और गुरुदेव, दोनों एक ही हैं।

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