आचार्य जी सादगी की प्रतिमूर्ति, राष्ट्रसंत एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में जाने जाते हैं। माताजी सादा, सरल एवं ममत्व, स्नेह से लबालब शक्तिस्वरूपा थीं। दोनों ही आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं। आदर्शवादी गायत्री परिवार का इतना बड़ा संगठन दोनों ने ममत्व से सींचकर अपने अथक प्रयत्न से खड़ा किया। इतने बड़े गायत्री परिवार का संगठन कितने प्रयत्न से बनाया गया तथा मानव गढ़ने का साँचा कैसे बनाया गया, इस बात को इनके जीवनक्रम को पढ़-समझकर जाना जा सकता है।
आचार्य जी के जीवन के प्रारंभिक वर्ष जन्मस्थली आँवलखेड़ा गाँव, आगरा जनपद में एक साधक, समाज सुधारक, पत्रकार तथा प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह बीते। इसके पश्चात के 30 वर्ष उन्होंने मथुरा में एक विलक्षण कर्मयोगी, संगठन निर्माता, भविष्यद्रष्टा के रूप में बिताए।
माताजी जब से सहयोगिनी के रूप में आईं आचार्य जी के प्रत्येक कार्य में हर क्षण साथ रहीं। दोनों ने शांतिकुंज, हरिद्वार को गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित किया। आचार्यजी ॠषि परंपरा के बीजारोपण एवं संरक्षण के लिए अंतिम श्वास गायत्री जयंती 2 जून, सन् 1990 तक लगे रहे।
वे श्रेष्ठ लेखक के साथ-साथ प्रखर वक्ता भी थे। जीवन भर आचार्य जी ने अपने वजन से अधिक का साहित्य लिखा। समृद्ध साहित्य का संपूर्ण लेखन एवं प्रकाशन मथुरा एवं शांतिकुंज में रहते हुए किया। आचार्य जी की क्रांतिकारी लेखनी से निकले विचारों को पढ़कर लाखों-करोड़ों व्यक्तियों का जीवन बदल गया। ममत्व भरे पत्रों तथा ओजस्वी वाणी के प्रभाव से जो भी इनसे मिले, इनके होते चले गए । वे एक विलक्षण प्रतिभा एवं क्षमता संपन्न देवमानव के रूप में माने जाते हैं।
आचार्य जी ने अपनी दिव्यदृष्टि से यह देख-समझ लिया था कि कोई महत्त्वपूर्ण तंत्र खड़ा करने के लिए अर्थात युग निर्माण जैसे कार्य को करने से पूर्व सुसंस्कारी आध्यात्मिक मनोभूमि के व्यक्तियों की आवश्यकता होगी, पहले उन्हें तैयार करना पड़ेगा। इसी हेतु पहले स्वयं को तपाया, अपने साथ-साथ माताजी को भी वैचारिक क्रांति में सहयोगिनी बनाया, तभी ऐसा सशक्त तंत्र खड़ा करने में सफलता प्राप्त की। आचार्य जी ने गायत्री महामंत्र के चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण करते हुए राष्ट्रसेवा तथा मिशन निर्माण का कार्य कर दिखाया।
सर्वप्रथम अखण्ड ज्योति पत्रिका एवं पत्राचार दो ऐसे माध्यम रहे, जिनके द्वारा प्रत्येक जन के मन को छुआ और अपना बनाया। इसके पश्चात गायत्री एवं यज्ञ के तत्त्वदर्शन से सबको जोड़ते चले गए।
उनसे साक्षात्कार करना हो तो उनके द्वारा लिखे गए उस विराट परिमाण में साहित्य के रूप में, युग संजीवनी को पढ़कर किया जा सकता है। उनके साहित्य ने करोड़ों का कायाकल्प किया है। एक संगठनकर्त्ता, गायत्री के सिद्ध-साधक, करोड़ों के अभिभावक, गायत्री महाविद्या के उद्धारक, ॠषि परंपरा एवं संस्कार परंपरा को पुनर्जीवन प्रदान करने वाले, नारी जागरण अभियान का सूत्रपात करने वाले, विचार शक्ति के विज्ञान के प्रणेता, धर्म एवं विज्ञान में समन्वयात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाले आचार्य जी, आध्यात्मिक समाजवाद तथा मानव धर्म के विकास के लिए साहित्य के रूप में अमूल्य निधि देकर गए हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, धर्म और दर्शन पर पुस्तकों का प्रकाशन कर एक विपुल साहित्य सृजन का कार्य किया तथा रूढ़ियों और मात्र कर्मकांडों में उलझे लोगों के समक्ष धर्म एवं अध्यात्म का अभिनव रूप प्रस्तुत किया।
हिमालय की ॠषि आत्मा का अवतरण
विश्व के प्रकाशस्तंभ महामानवों एवं देवदूतों की शृंखला में एक नई कड़ी के रूप में पं० श्रीराम शर्मा आचार्य का नाम जोड़ा जाता है। ईश्वर का मानव जाति को दिया गया आश्वासन है कि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब वह पृथ्वी पर अवतरित होकर विश्व की व्यवस्था को संतुलित करने का प्रयास करेंगे। इसी शृंखला में आचार्यश्री का जन्म आगरा जिले के आँवलखेड़ा गाँव में विक्रम संवत् 1968 आश्विन कृष्णा त्रयोदशी तदनुसार 20 सितंबर, सन् 1911 को प्रात: 9 बजे हुआ। इनके पिता पंडित रूपकिशोर शर्मा एवं माता दानकुँवरि ने मनु-शतरूपा की भाँति तप-साधना करके दिव्यात्मा को अपने घर में जन्म लेने के लिए विवश कर दिया।
पूरे मन से एक ही प्रार्थना की गई कि उनके यहाँ एक ऐसी संतान का जन्म हो, जो अपने कार्यों से विश्व-वसुधा को धन्य कर दे। पंडित रूपकिशोर शर्मा एक बड़े जमींदार और श्रीमद्भागवत के प्रकांड विद्वान थे। क्षेत्र में जनसामान्य में एवं राजे-रजवाड़ों में उनका बहुत सम्मान था। माता दानकुँवरि जी एक सीधी, सरल, निष्ठावान, शीलवती, बाल तपस्विनी एवं धर्मपरायण महिला थीं; जिन्हें सभी लोग ताईजी कहकर पुकारते थे।
आचार्यश्री जब गर्भ में थे तब ताईजी को अनेक विचित्र अनुभव होने लगे। कभी घर में हवन जैसी सुगंध आती, कभी मधुमक्खियों का झुंड घर में आ जाता। कभी घर के दरवाजे पर अनेक गायों का झुंड आ जाता, जो देर तक खड़ी रहतीं और गुड़ खाकर ही जातीं। ताईजी ने जब ये बातें पंडित जी को बताईं तो वे बोले कि घबराओ नहीं, ये सब शुभ संकेत हैं; कोई दिव्य आत्मा परिवार में आने वाली है। जन्म के बाद पंडितों ने बताया कि आपके घर में योगी महान आत्मा का अवतरण हुआ है। जन्म के बाद दरवाजे पर संत, महात्मा, संन्यासी आने लगे। घर में मधुर संगीत का स्वर गूँजने लगा, जैसे मंत्रोच्चारण हो रहा हो।
शुभ दिन था, जब बालक का नामकरण संस्कार हुआ। बालक का नाम ‘श्रीराम’ रखा गया। उस समय पंडितों ने बताया कि यह बालक हिमालय की सिद्ध ॠषि आत्मा है। यह सुनकर ताईजी को चिंता हुई कि बालक संन्यासी हो जाएगा तो घर छोड़कर चला जाएगा। श्रीराम जब बड़े हुए तब उनने उन्हें (ताईजी को) आश्वस्त किया - माँ मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। जो कुछ करूँगा आपसे आज्ञा लेकर ही करूँगा।