पंद्रह वर्ष की आयु में सन् 1926 वसंत पंचमी के दिन घर की पूजा की कोठरी (आँवलखेड़ा गाँव) में पूजा के समय दीपक के प्रकाश में सूक्ष्म शरीरधारी (आचार्य जी के गुरु) मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार हुआ ।
आचार्य जी ने उन्हीं हिमालयवासी ॠषिसत्ता को अपने समस्त क्रियाकलापों का प्रेरणास्रोत माना । उन्हीं के निर्देश पर तपस्वी जीवन का आरंभ हुआ । उनके निर्देशों का आचार्य जी ने पालन किया और जीवन को तदनुरूप चलाया । यह उनकी जीवन यात्रा का महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है ।
पहला निर्देश— अखंड दीपक प्रज्वलित कर चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण करने हैं । इसमें आहार शुद्धि पर विशेष ध्यान देना है ।
दूसरा निर्देश— अखंड दीपक एक प्रकाशपुंज के रूप में निरंतर जलाए रखना , जो उनके और स्वयं के संबंध की स्मृति बनाए रखने का कार्य करेगा । यह आज तक सतत प्रज्वलित है ।
तीसरा निर्देश— स्वाध्याय करते हुए आर्ष साहित्य का पुनरुद्धार कर उसे जन-जन के लिए सुलभ बनाना, जो आचार्य जी ने घीयामंडी, मथुरा में रहते पूरा किया ।
चौथा निर्देश— महापुरश्चरण करते हुए युगधर्म का निर्वाह करने हेतु स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी करनी है अर्थात राष्ट्रहित में स्वयं के जीवन को लगाना है । उन्होंने लंबी अवधि तक देश सेवा का कार्य किया ।
मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार और प्राप्त निर्देश
प्रतिदिन की भाँति ब्राह्ममुहूर्त में साधना चल रही थी। वसंत पर्व सन् 1926 की ब्राह्ममुहूर्त की वेला थी। समाधि में किशोर श्रीराम का जप पूरा होने ही वाला था कि साधना की कोठरी में यकायक चकाचौंध करने वाला प्रकाश हो गया, किशोर श्रीराम डरे तो एक सौम्य ॠषि की आकृति प्रकट हुई, जो तेजस्विता से भरपूर और दिगंबर थी। वह हिमालय के महान योगी की आत्मा थी। वह बोली—‘‘डरो नहीं, मैं तुमसे कई जन्मों से परिचित हूँ।’’ किशोर श्रीराम समझ गए कि स्वयं सविता देवता प्रकट हुए हैं। ॠषिसत्ता ने सिर पर हाथ रखा। गुरुदेव ने लिखा है कि ‘‘वह स्पर्श व्यक्तित्व में ऐसी झंकार भर गया कि शब्दों में नहीं बताया जा सकता, अनुभूति के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।’’
ॠषिसत्ता ने पिछले तीन जन्मों का विवरण बताया और कहा— ‘‘पहला जन्म संत कबीर, दूसरा जन्म समर्थ गुरु रामदास और तीसरा जन्म स्वामी रामकृष्ण परमहंस के रूप में रहा था। ये सभी जन्म विलक्षण रहे, लेकिन प्रस्तुत जीवन और भी विलक्षण रहेगा। इस जन्म में अवतारी सत्ता के समान पुरुषार्थ करना है। एक बड़ा संगठन खड़ा करना है।’’
किशोर श्रीराम को प्रकाश के रूप में आत्मसाक्षात्कार हुआ। सभी दिव्य आत्माओं को इसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार होता है। यही गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता थी; जिसे पूज्यवर स्वामी सर्वेश्वरानंद के नाम से संबोधन देते रहे। पंद्रह वर्ष की आयु में किशोर श्रीराम ने मार्गदर्शक सत्ता के निर्देश पर अखंड दीपक प्रज्वलित कर दिया,
जिसके संरक्षण में 24 वर्ष तक 24-24 लाख गायत्री मंत्र जप के 24 महापुरश्चरणों की शृंखला प्रारंभ करने का निर्देश मिला। गाय को साबुत जौ खिलाए जाते, गोबर में से निकालकर धोकर-सुखाकर-पीसकर आटे की दो रोटी और छाछ भोजन के रूप में ग्रहण करते हुए महापुरश्चरण प्रारंभ कर दिए गए। आगे के निर्देशों के लिए बार-बार हिमालय आने का निर्देश मिला। अखंड दीपक की प्रेरणा से अध्यात्म तंत्र परिष्कार हेतु नवयुग का सूत्रपात हुआ। अखंड दीपक की ज्योति को लक्ष्य करके ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का शुभारंभ सन् 1937 में किया गया, जो 87 वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो रही है।