यज्ञ की महिमा अपरंपार है । यज्ञ का भावार्थ है— परमार्थ, उदार कृत्य । संस्कृत की यज् धातु से यज्ञ शब्द बना है, जिसके तीन अर्थ होते हैं—(1) देवपूजन (देवत्व संवर्द्धन) (2) संगतिकरण (3) दान ।
यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्मः ।
यज्ञ ही संसार का श्रेष्ठतम शुभ कार्य है ।
नास्ति यज्ञं समं दानं, नास्ति यज्ञ समोविधि ।
यज्ञ के समान कोई दान नहीं यज्ञ के समान और कोई विधान नहीं ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो, यज्ञः कर्म समुद्भवः । — गीता 3-14
यज्ञ से पर्जन्य (दिव्य प्राण संपन्न वर्षा) होकर प्राणियों, वनस्पतियों को पुष्ट करती है, यज्ञ उत्तम विहित कर्मों से संपन्न होता है।
* यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है ।
* यज्ञ संसार की सेवा का, विश्व में सुख-शांति उत्पन्न करने का एक उत्तम माध्यम एवं पुण्य-परमार्थ है ।
* यज्ञ को वेदों में ‘कामधुक्’ कहा गया है, जिसका आशय यही है कि वह मनुष्य के समस्त अभावों को तथा बाधाओं को दूर करने वाला है ।
* सच्चे हृदय से यज्ञ करने वाले मनुष्यों का लोक-परलोक सुधरता है ।
* निष्काम भाव से यज्ञानुष्ठान करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है ।
* यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता संसार का कल्याण करते हैं ।
* यज्ञ एक ऐसा विज्ञानमय विधान है, जिससे मनुष्य का भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कल्याणकारक उत्कर्ष होता है ।
* यज्ञ में जो कुछ धन-सामग्री, श्रम लगाया जाता है, वह कभी निरर्थक नहीं जाता ।
* यज्ञ से अदृश्य आकाश में, जो आध्यात्मिक विधुत तरंगें फैलती हैं, वे लोगों के मन से द्वेष, पाप, अनीति, वासना, स्वार्थपरता, कुटिलता आदि बुराइयों को हटाती हैं ।
* जन्म से लेकर अंत्येष्टि तक सभी संस्कारों के साथ ही कथा-कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्योहार, उत्सव, उद्यापन में यज्ञ-हवन (अग्निहोत्र) को धार्मिक मान्यता प्राप्त है ।
* दैनिक/साप्ताहिक/पाक्षिक (अमावस्या-पूर्णमासी) मासिक किसी-न-किसी रूप में यज्ञ-परंपरा को जारी रखा जाए तो वह भारतीय संस्कृति की एक बड़ी भारी सेवा होगी ।
* यज्ञाग्नि की विशेषताएँ हैं— (1) सदा ऊँचा सिर रखना (2) जो भी संपर्क में आए, उसे अपने समतुल्य बना लेना (3) जो मिले उसका संचय न करके विश्व-वसुधा के लिए बिखेर देना (4) अपने अस्तित्व में गरमी और प्रकाश की कमी न पड़ने देना (5) अपनी सामर्थ्य को लोकहित में नियोजित किए रहना ।
* गायत्री-उपासना के लिए यज्ञ आवश्यक है । सभी को यज्ञ-परंपरा जारी रखनी चाहिए । अपने घर का, अपनी मनोभूमि का वातावरण यज्ञमय रहे, यज्ञ भगवान की पूजा होती रहे, यह प्रयत्न करना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है ।
* आज की प्रचंड असुरता का समाधान करने के लिए सद्बुद्धि रूपिणी गायत्री माता और त्यागमय प्रेम के प्रतीक यज्ञ पिता का दसों दिशाओं में तुमुल घोष करना आवश्यक, अनिवार्य और अवश्यंभावी है ।
* यज्ञ-आंदोलन की युगपरिवर्तनकारी योजना को हर परिस्थिति में जीवंत बनाए रखना हमारे लिए आवश्यक है ।
यज्ञ महिमा —
यज्ञ रूप प्रभो! हमारे, भाव उज्ज्वल कीजिए।
छोड़ देवें छल-कपट को, मानसिक बल दीजिए॥
वेद की बोले ॠचाएँ, सत्य को धारण करें।
हर्ष में हों मग्न सारे, शोक सागर से तरें॥
अश्वमेधादिक रचाएँ, यज्ञ पर उपकार को।
धर्म- मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को॥
नित्य श्रद्धा-भक्ति से, यज्ञादि हम करते रहें।
रोग पीड़ित विश्व के, संताप सब हरते रहें॥
कामना मिट जाए मन से, पाप अत्याचार की।
भावनाएँ शुद्ध होवें, यज्ञ से नर-नारि की॥
लाभकारी हो हवन, हर जीवधारी के लिए।
वायु, जल सर्वत्र हों, शुभ गंध को धारण किए॥
स्वार्थ भाव मिटे हमारा, प्रेम-पथ विस्तार हो।
इदं न मम का सार्थक, प्रत्येक में व्यवहार हो॥
हाथ जोड़ झुकाय मस्तक, वंदना हम कर रहे।
नाथ! करुणारूप करुणा, आपकी सब पर रहे॥
यज्ञ रूप प्रभो.......