मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक

गायत्री माहात्म्य

आद्यशक्ति गायत्री की महिमा 

गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री ।    ऐतरेय ब्राह्मण

जो गय (प्राण) की रक्षा करती है, वह गायत्री है ।   

ब्रह्मगायत्रीति-ब्रह्म वै गायत्री ।  —शतपथ ब्राह्मण 8.5.3.7.

ब्रह्म गायत्री है, गायत्री ही ब्रह्म है ।    

गायत्री तु परं तत्त्वं गायत्री परमागति:।  —बृहत् पाराशर स्मृ० 4.4.

गायत्री परम तत्त्व है, गायत्री परम गति है ।    

गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च ।   — छांदोग्य उप० 3.12.1

यह विश्व जो कुछ भी है, वह समस्त गायत्रीमय ही है ।    

वेदमाता गायत्री आयुप्राणशक्तिपशुकीर्तिधन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली हैं —अथर्व०19.71.1

गायत्री के समान चारों वेदों में मंत्र नहीं है।  संपूर्ण वेदयज्ञतपदान गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं हैं। —विश्वामित्र

जिस प्रकार पुष्प का सार मधुदूध का सार घृत है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है ।  —व्यास

ब्रह्मा आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैंवह ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है ।   —भरद्वाज

गायत्री वेदों की जननी हैपापों का नाश करने वाली हैइससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है।  याज्ञवल्क्य

सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने जिस शक्ति की साधना करके विश्व संचालन के उपयुक्त ज्ञान एवं विज्ञान प्राप्त करने की सामर्थ्य प्राप्त की, पौराणिक प्रतिपादन के अनुसार  उसका  नाम  गायत्री  है ।  गायत्री  को  वेदमाता,  ज्ञान-गंगोत्तरी,  संस्कृति  की   जननी  एवं  आत्मबल  की  अधिष्ठात्री  कहा  जाता  है ।

 

 

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