अखण्ड ज्योति पत्रिका में छपने वाली निम्न पंक्तियाँ बताती हैं कि अखण्ड ज्योति पत्रिका के सूत्र-संचालक का क्या उद्देश्य रहा। वे लेखनी द्वारा लोक-शिक्षण का सूत्रपात कर युग-परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे—
सुधा बीज बोने से पहले कालकूट पीना होगा।
पहन मौत का मुकुट विश्वहित मानव को जीना होगा॥
कविता की इन पंक्तियों के द्वारा वे जनसामान्य को बताना चाहते थे कि विश्वव्यापी दुष्प्रवृत्तियों का हलाहल स्वयं पीकर मृतप्राय लोगों को संजीवनी का रसास्वादन कराने के लिए जीवन भर सदा प्रयास करना होगा। यह अध्यात्म क्षेत्र में उतरने वालों के लिए एक चेतावनी भी थी।
सन् 1937 में अखण्ड ज्योति पत्रिका का पहला अंक आगरा से प्रकाशित किया गया। कुछ समय बाद मथुरा के घीयामंडी में एक मकान किराये पर लेकर अखण्ड ज्योति कार्यालय बनाकर विधिवत् प्रकाशन प्रारंभ किया। यहीं पर जप-तप की साधना भी निरंतर संपन्न की जाती रही और लेखन-प्रकाशन का कार्य भी घीयामंडी से ही प्रारंभ हुआ। पैरों से चलने वाली छोटी ट्रेडिल मशीन लगाई। पत्रिका प्रकाशन, गायत्री-साधना, व्यक्तिगत संपर्क, पत्राचार, स्वाध्याय, लेखन-प्रकाशन की व्यवस्था, कागज का प्रबंध, पत्रिका के लिए रजिस्ट्रेशन आदि सभी कार्य स्वयं आचार्य जी करते थे। विभिन्न विषयों पर साहित्य का लेखन किया।
आरंभ में अखण्ड ज्योति में जो लेख दिए जाते थे; उनमें रुचि अनुरूप सामग्री मिलती थी। प्रकृति, मन:स्थिति तथा रुचि को देखकर लेख प्रकाशित होते थे। जैसे—सम्मोहन विद्या, निद्रा विज्ञान, आकृति देखकर व्यक्ति की पहचान, परकाया प्रवेश, वशीकरण की सच्ची सिद्धि, मनचाही संतान, भोग से योग, हस्तरेखा विज्ञान आदि। आत्मज्ञान की घुट्टी कड़ुई थी, इसीलिए आरंभ में ऐसे विषयों पर लेख देकर पाठक बनाते रहे। सब अध्यात्म विद्या से ही संबंधित होते थे। शीर्षक आकर्षक बनाकर बात समझाई जाती थी।
अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी ही वह स्थान था, जो भारतीय संस्कृति, साधना, संस्कार एवं अध्यात्म के विस्तार का आधार बना था। आचार्य जी ने महत्त्वपूर्ण लेखन, साधना, उपासना एवं शोधकार्य साथ-साथ किए। अपने अनुसंधान और चिंतन, अनुभव के आधार पर आचार्य जी ने गायत्री-साधना के समग्र रूप का प्रस्तुतीकरण ‘गायत्री महाविज्ञान’ के तीन खंड रचकर किया, जो गायत्री संबंधी विश्वकोश माना जाता है।
चारों वेद, 108 उपनिषद्, 6 दर्शन, 20 स्मृतियाँ, 18 पुराण आदि ग्रंथों का भाष्य एवं 3200 पुस्तकों का लेखन मथुरा एवं शांतिकुंज में रहते हुए किया। अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा की इस गायत्री परिवार गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान में अखण्ड ज्योति कार्यालय बिरला मंदिर के सामने मथुरा-वृंदावन रोड जयसिंहपुरा, मथुरा पर कार्यरत है । पहली पुस्तक लिखी—‘मैं क्या हूँ’ जो फ्रीगंज आगरा से प्रकाशित हुई। कुछ अंक अखण्ड ज्योति के भी वहीं से प्रकाशित हुए।
आचार्य जी ने लेखन सत्रों का भी आयोजन किया। उनके प्रयत्नों से सैकड़ों परिजनों ने लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। ‘सैनिक अखबार’ में कार्य करने से लेकर जीवन के अंतिम दिनों तक अगणित लोगों को कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, अनुवादक आदि बना दिया।