बालक श्रीराम का लालन-पालन उनकी माता श्रीमती दानकुँवरि अर्थात ताईजी के संरक्षण में हुआ। सभी लोग उन्हें ताईजी कहकर पुकारते थे। किशोरावस्था तक का जीवन ग्रामीण परिवेश में ही व्यतीत हुआ। प्रारंभिक शिक्षा माता-पिता के संरक्षण में हवेली में ही संपन्न हुई। विधिवत् शिक्षा के लिए चार वर्ष की आयु में, बालक श्रीराम को एक अध्यापक पं० रूपराम जी के पास भेजा गया। वे घर पर ही पाठशाला चलाते थे। जन्मजात प्रतिभासंपन्न बालक श्रीराम ने थोड़े ही समय में आवश्यक शिक्षा प्राप्त कर ली। कोई डिग्री न होने पर भी वे ज्ञान के भंडार थे। (बाद में तो आचार्य स्तर के विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन दे दिया करते थे) वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।
कृषि एवं पशुपालन की जानकारी से युक्त कार्बन कॉपी किए पत्रक साप्ताहिक हाट में पढ़े-लिखे ग्रामीणों में वितरित किया करते थे। बालक श्रीराम शरीर से दुबले-पतले, लेकिन साहस के धनी थे। खतरनाक जीव-जंतुओं से भी उन्हें डर नहीं लगता था। जंगल में अकेले चले जाते और किसी पेड़ के नीचे घंटों ध्यान-साधना में बैठे रहते। अँधेरा होने पर घरवाले उन्हें ढूँढ़कर लाते।
अपने पिताजी से भागवत चर्चा बहुत ध्यान एवं रुचि से सुनते, याद कर लेते और फिर अपने साथियों-मित्रों को सुनाया करते। विद्या-विस्तार का बीजारोपण यहीं से हुआ, जो जीवनपर्यंत चलता रहा। आर्ष ग्रंथों एवं महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़ने में उन्हें विशेष रुचि थी। खेल-खेल में पृथ्वी पर ‘ॐ’ और ‘स्वस्तिक’ बनाया करते। उन्हें बचपन से ही दीन-दु:खियों, गरीबों, असहायों, अनाथों, रोगियों की सेवा करना, वस्त्र देना एवं भोजन कराना अच्छा लगता था।
साधना के अंकुर बाल्यकाल से
बालक श्रीराम के रूप में हिमालय की ॠषि आत्मा अवतरित हुई थी। एक बार वे हिमालय जाने के लिए घर से निकल गए, 10 किलोमीटर दूर किसी परिचित ने पहचान लिया, वह उन्हें वापस घर पर लाया। यह पूछने पर कि कहाँ जा रहे थे, तो बोले अपने घर जा रहा था। कहाँ है तुम्हारा घर? तो बताया कि मेरा घर हिमालय है। अँगरेजी शिक्षा के लिए बालक को भेजने का प्रबंध किया जाने लगा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। इससे ताईजी को चिंता हुई कि पढ़ाई के बिना बड़ा होकर क्या करेगा। बालक से पूछा तो बोले— ‘‘मैं स्वयं स्वावलंबी बनूँगा और अन्य लोगों को भी स्वावलंबी बनाऊँगा।’’ छोटी आयु में ही बालक श्रीराम ने अस्त्र-शस्त्र की विद्या भी सीख ली और अपने साथियों को भी सिखा दी।
स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। पं० रूपकिशोर शर्मा के सहपाठी मित्र पं० मदन मोहन मालवीय जी आगरा आए हुए थे। पं० रूपकिशोर शर्मा उनसे मिलने आगरा आए और उनसे आँवलखेड़ा चलने का आग्रह किया। दोनों मित्र घोड़े की बग्गी से आँवलखेड़ा आए। बालक श्रीराम कुछ मिष्टान्न के साथ जल लेकर आए, प्रणाम किया। मालवीय जी बालक को देखकर बोले—‘‘रूपकिशोर इस बालक को तो तुम मुझे दे दो।’’ पंडित जी बोले—‘‘दद्दा! तुमने मेरे मुँह की बात छीन ली।’’ बनारस में यज्ञोपवीत कराने का निश्चय किया गया। 8 वर्ष की आयु में बालक श्रीराम का यज्ञोपवीत संस्कार मालवीय जी ने कराया। कान में गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हुए बताया कि बेटा!
‘ब्राह्मण के लिए गायत्री कामधेनु होती है, लेकिन अभीष्ट फल प्राप्त करने के लिए श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रज्ञा का अवलंबन लेना आवश्यक होता है। "बात याद तो हो गई, लेकिन समझ में न आई।" वापसी यात्रा में पूज्य पिताश्री से इसका विस्तृत ज्ञान एवं शंका का समाधान पाया। पिताश्री ने बालक में साधना के प्रति गहरी रुचि जगा दी और यज्ञोपवीत का दर्शन बालक को भली भाँति समझा दिया। गायत्री उनके लिए इष्ट बनीं, स्वयं साधना की और करोड़ों साधकों से गायत्री-साधना करा ली। पाँच माला नित्य का संकल्प लिया, लेकिन 11 माला नित्य साधना चलती रही।
अब बालक श्रीराम किशोर हो रहे थे। गायत्री-उपासना-साधना से बालक में ब्राह्मणत्व जाग्रत होता गया। स्वयं पढ़ना-लिखना, मित्रों-बड़ों को पढ़ाना, ध्यान-साधना सिखाना प्रारंभ हो गया। समाजसेवा और समाजसुधार की प्रवृत्ति बचपन से ही प्रारंभ हो गई थी। हवेली के एक कमरे में साधनाकक्ष बना लिया गया। प्रात: ब्राह्ममुहूर्त में जागकर स्नान आदि के पश्चात संध्या-वंदन प्रारंभ हो जाता।