एक हरिजन महिला, नाम था—छपको, नित्य सफाई के लिए हवेली आती थी। एक बार कई दिन तक नहीं आई तो बालक श्रीराम बस्ती से थोड़ा अलग हरिजन टोला में उसके घर पहुँच गए। देखा तो छपको को कोढ़ हो रहा था, घाव से मबाद रिस रहा था, दरद से कराह रही थी। बालक श्रीराम बाजार से दवा-पट्टी लाए और उसकी तीमारदारी की तो उसे आराम मिला। कई दिन तक उसकी सेवा की तो वह ठीक हो गई। जब छपको स्वस्थ हो गई तो बस्ती में आने लगी। जहाँ बालक श्रीराम को देखती, दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद देती कि ‘‘बेटा! तू किसी दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।’’ गाँव के लोगों से कहती कि इस गाँव में भगवान ने जन्म ले लिया है, तुम लोग पहचान नहीं रहे हो।
हवेली में घोड़ों की देख-भाल करने वाला हरिजन युवक गिरिधर बालक श्रीराम से बोला कि पंडित जी हमारे घर तो सत्यनारायण की कथा हो ही नहीं सकती; क्योंकि हम अछूत हैं। बालक श्रीराम बोले कि कल तुम्हारे यहाँ कथा होगी।
गोबर-मिट्टी से आँगन लीपकर शुद्धता, पवित्रता के निर्देश देकर तैयार रहने को कह दिया। समय से बालक श्रीराम अपना सामान लेकर कथा कहने पहुँच गए। दिव्य अवतारी सत्ता जाति, धर्म के बंधन से जन्म से ही मुक्त थी।
एक बार की घटना है कि एक कसाई दों गायों को वध के लिए ले जा रहा था। बालक श्रीराम ने कसाई को गायों का मूल्य देकर खरीद लिया और किराये की बैलगाड़ी ली, उस पर गायों को बिठाकर हाथरस गोशाला पहुँचाया, बैलगाड़ी का एक बैल लँगड़ा रहा था, श्रीराम उस बैल की जगह स्वयं जुत गए और लक्ष्य तक बैलगाड़ी को पहुँचाने में सफलता पाई। वे दया और करुणा के सागर थे। एक बार एक अँगरेज एक महिला का घोड़े से पीछा कर रहा था। महिला घबराई हुई भाग रही थी; कोई सहायता को न आ रहा था। बालक श्रीराम से न देखा गया, पत्थर उठाकर अँगरेज के सिर में दे मारा, खून बह निकला, वे भाग गए और महिला की रक्षा हुई।
गाँव में हुब्बलाल पटवारी रहते थे, जो किसानों को बहुत सताते थे। वृद्धावस्था में असहाय पड़े थे, दरद से कराहते, मक्खियाँ भिनभिनाती रहतीं, कोई सेवा करने को तैयार न होता। स्वयं कहते कि मैंने जो लोगों को सताया था, उसी का फल भोग रहा हूँ। पहले बालक श्रीराम ने स्वयं उनकी सेवा की, बाद में बाल सेना ने पटवारी हुब्बलाल की सेवा का दायित्व उठाया। बालक श्रीराम का संदेश था—‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’ स्वावलंबन का संदेश देने के लिए घर के पास ही ‘बुनताघर’ खोला, जहाँ बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाता था।
पैत्रिक संपत्ति से ताईजी के नाम से ‘दानकुँवरि इंटर कॉलेज’ लड़कों के लिए प्रारंभ किया। बाद में आँवलखेड़ा में शक्तिपीठ की स्थापना हुई, लड़कियों का इंटर कॉलेज भी खुला, जो अब डिग्री कॉलेज हो गया है। आँवलखेड़ा में अब वंदनीया माताजी के नाम से अस्पताल भी है। बालक श्रीराम में देवत्व के, महानता के, ईश्वरत्व के गुण जन्म से ही थे। कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। बचपन के लक्षण, गतिविधियाँ, क्रियाकलाप देखकर ही लगता था कि कोई अवतारी सत्ता बालक श्रीराम के रूप में अवतरित हुई है।