आचार्य जी ॠषि परंपरा का बीजारोपण करके नई गतिविधियाँ चलाना चाहते थे। इस हेतु मथुरा छोड़कर हरिद्वार में निवास के लिए स्थान देखा और सप्तर्षि क्षेत्र में सन् 1968 में भूमि खरीदी तथा गुरुपूर्णिमा सन् 1969 से उस आश्रम का निर्माण मथुरा में रहते हुए आरंभ करा दिया था, जिसे आज गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार के नाम से जानते हैं।
आचार्य जी ने 60 वर्ष की आयु में 20 जून, सन् 1971 को सदा के लिए मथुरा छोड़कर शांतिकुंज, हरिद्वार प्रस्थान किया। माताजी को नए शक्तिकेंद्र शांतिकुंज का संचालक बनाकर उन्होंने हिमालय उग्र तपश्चर्या हेतु प्रस्थान किया। आचार्य जी के आदेशानुसार माताजी ने देवकन्याओं को साथ लेकर अखंड दीपक के सान्निध्य में 24 घंटे अखंड जप का क्रम चलाया। चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण माताजी ने भी अखंड दीपक की साक्षी में पूरे किए।
देवकन्याओं के लिए एक वर्ष के प्रशिक्षण शिविर, महिला प्रशिक्षण सत्र चलाए गए। सन् 1972 की गायत्री जयंती के बाद से शांतिकुंज हरिद्वार में ॠषि परंपरा का बीजारोपण कर उस स्थान को एक सिद्धपीठ के रूप में विकसित करने में आचार्य जी एवं माताजी ने पूरा जीवन समर्पित किया। आचार्य जी ने भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु विदेश की यात्राएँ कीं। शांतिकुंज में जाग्रत आत्माओं के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन, चांद्रायण व्रत, वानप्रस्थ सत्र, युगशिल्पी सत्र एवं संजीवनी साधना सत्रों का आयोजन किया जाने लगा।
शांतिकुंज को शासन द्वारा नैतिक शिक्षा, व्यक्तित्व परिष्कार, स्काउट-गाइडिंग प्रशिक्षण हेतु मान्यता प्राप्त है। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा शिक्षकों एवं प्रधानाचार्यों के व्यक्तित्व परिष्कार हेतु समय-समय पर शिविर आयोजित किए जाते हैं।
राष्ट्रीय जलागम परियोजना का प्रशिक्षण केंद्र भी शांतिकुंज को बनाया गया। राष्ट्र के 350 जिलों के 3600 ब्लॉकों में भूमि व जल संरक्षण द्वारा विकास के कार्यक्रमों, दीपयज्ञों के संचालन का दायित्व शांतिकुंज को सौंपा गया।
प्राकृतिक विपत्ति निवारण सलाहकार परिषद् की शांतिकुंज को सदस्यता प्राप्त है। आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा आपदा के समय नि:शुल्क सहायता प्रदान की जाती है।
हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र में ॠषिकेश रोड पर स्टेशन से 6 कि.मी. दूर महर्षि विश्वामित्र की तप:स्थली पर युगॠषि परमपूज्य आचार्य पं० श्रीराम शर्मा एवं वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा ने अपनी प्रचंड तप-साधना से विशाल, दर्शनीय, जीवंत तीर्थ शांतिकुंज का निर्माण किया।
स्थापनाएँ—युगतीर्थ में दिव्य प्राण-ऊर्जा का प्रचंड प्रवाह बनाए रखने के लिए स्थापित हैं—
हजारों-करोड़ों गायत्री मंत्र जप से अनुप्राणित अखंड दीप।
हजारों नैष्ठिक साधकों द्वारा नित्य आहुतियों से पुष्ट ‘अखंड अग्नि’।
युगशक्ति गायत्री का प्राणवान मंदिर, दिव्य जीवन विद्या के मूर्द्धन्य ‘सप्तर्षियों की प्रतिमाएँ’, तीर्थ चेतना के स्रोत ‘प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा’ के प्रतीक।
आध्यात्मिक ऊर्जा के सनातन केंद्र देवात्मा हिमालय का भव्य मंदिर, मनुष्य में देवत्व जगाने वाले सभी धर्म-संप्रदायों के पवित्र प्रतीक चिह्न, जड़ी-बूटियों की दुर्लभ वाटिका और गायत्री परिवार की स्थापना से लेकर अब तक की गतिविधियों पर आधारित प्रदर्शनी आदि।
गतिविधियाँ—
युगतीर्थ, आध्यात्मिक सैनोटोरियम कहे जाने वाले इस आश्रम में व्यक्ति, परिवार एवं समाज निर्माण की अनेक प्रभावशाली गतिविधियाँ नियमित रूप से चलती रहती हैं। जैसे—जीवन जीने की कला के नौ दिवसीय सत्र (प्रतिमाह तीन)।
लोकसेवियों के युगशिल्पी सत्र (प्रतिमास 1 से 29 तारीख तक)। ग्राम्य विकास प्रशिक्षण, कुटीर उद्योग प्रशिक्षण, नैतिक शिक्षा हेतु शिक्षण-प्रशिक्षण, ग्राम स्वास्थ्य सेवियों के विशेष सत्र, विविध प्रशासनिक अधिकारियों के लिए व्यक्तित्व परिष्कार सत्र आदि। सभी प्रशिक्षण नि:शुल्क हैं। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रांति के अभियान का संचालन केंद्र।
देश-विदेश में स्थापित हजारों गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों का मार्गदर्शन केंद्र, पत्राचार विभाग एवं साधकों-लोकसेवियों के लिए प्रेरणा-परामर्श आदि की व्यवस्था है। सैकड़ों उच्च शिक्षित सेवाभावी स्वयंसेवक सारी गतिविधियों को संचालित करते हैं।
पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जन्म शताब्दी चिकित्सालय, मिशन की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का संपादन/प्रकाशन, भव्य साहित्य केंद्र, विदेश विभाग, स्वावलंबन विद्यालय, मल्टीमीडिया आदि स्थापनाएँ हैं।
संपर्क सूत्र—
शांतिकुंज, हरिद्वार (उत्तराखंड) 249411
फोन नंबर : (01334) 325876, 260602, 260403, 261485, 261955, 260309
फैक्स : (91-1334) 260866
ई-मेल : shantikunj@awgp.org
विस्तृत जानकारी के लिए संस्थान की वेबसाइट www.awgp.org देखें ।