नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्यति तरन्ति ते। अर्थात- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दु:खों से पार हो जाता है। —महाभारत शांति पर्व

आचार्यश्री की जीवनसंगिनी के रूप में

वंदनीया माताजी का विवाह आचार्यश्री के साथ बिना दिखावा और प्रदर्शन के सादगी के साथ संपन्न हुआ। यह मानवता के सम्मुख जीवन दर्शन प्रस्तुत करने वाले ॠषियुग्म का मंगल परिणय था। यह तप और श्रद्धा का, ज्ञान और भक्ति का अनोखा संगम था। विवाह के साथ ही वंदनीया माताजी के जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। शुभ घड़ी में दोनों आदर्श पति-पत्नी के रूप में आदर्शपथ पर एक साथ चलने के लिए संकल्पित हुए थे। इस संयोग में सर्वेश्वर सदाशिव और महाशक्ति के मिलन जैसी अलौकिकता थी।

यह पूज्यवर की साधना की तीव्रता का समय था। महापुरश्चरणों की शृंखला अंतिम चरणों में थी। अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन नियमित प्रारंभ हो गया था। पत्रिका के माध्यम से संगठन बनना प्रारंभ हो गया था।

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