* हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी, मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे |
* शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे |
* मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एव सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे |
* इंद्रियसंयम, अर्थसंयम, समयसंयम और विचारसंयम का सतत अभ्यास करेंगे
* अपने आप को समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे |
* मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्त्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे |
* समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन अंग मानेंगे |
* चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे |
* अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे |
* मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं , उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे |
* दूसरों के साथ वह व्यवहार नही करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं |
* नर–नारी परस्पर पवित्र द्रष्टि रखेंगे |
* संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे l
* परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे |
* सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे |
* राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान रहेंगे |
* जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, संप्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव नहीं बरतेंगे |
* मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा |
* हम बदलेंगे – युग बदलेगा, हम सुधरेंगे – युग सुधरेगा, इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है |