स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते। अर्थात स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है । —गीता 17/15

बोया और काटा का अकाट्य सिद्धांत

आचार्य जी ने जमींदारी के बांड्स एवं जमीन को भी गायत्री तपोभूमि की जमीन खरीदने तथा आँवलखेड़ा में इंटर कॉलेज बनवाने में लगा दिया तथा शक्तिपीठ का निर्माण कराया। आचार्य जी ने जो बोया, वह सौगुना होकर भगवान ने लौटाया। आचार्य जी कहते रहे—‘‘बात आत्मसमर्पण से आरंभ की जा सके तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम निकलता है। जो भी पूज्य गुरुदेव के पास आया, वे उसे जी भर अनुदान देते रहे, कभी निराश नहीं लौटाया। कुछ गिने-चुने प्रारब्धग्रस्तों को छोड़कर प्राय: उन सभी की उन्होंने भरपूर सहायता की, जो तनिक-सा सहयोग या अनुदान पाने की इच्छा से उनके पास आए। आचार्य जी को सम्मान पाने की कभी लालसा नहीं रही, सदैव दूसरों को सम्मान देते रहे। इसी कारण इतने महान व्यक्तित्वसंपन्न बने। उनका आभामंडल हँसता-मुस्कराता, खिलखिलाता चेहरा बरबस हर किसी को अपना अंतरंग बना लेता था।

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