नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्यति तरन्ति ते। अर्थात- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दु:खों से पार हो जाता है। —महाभारत शांति पर्व

माताजी का बाल्यकाल

परिवार में सभी लोग उन्हें लाली कहकर पुकारते थे। अपनी आयु की सब लड़कियों में वे सबसे समझदार और जिम्मेदार लगती थीं। चार वर्ष की आयु से ही शिव-आराधना प्रारंभ कर दी। 'ॐ नम: शिवाय' का जप करना, पूजा के बाद सूर्य को जल अर्पित करना, चिड़ियों को दाना डालना, पालतू पशुओं की सेवा करना उनके नित्य कर्म थे। अपनी सहेलियों से मिलतीं तो सहेलियाँ अपने लौकिक जगत् की, रिश्तेदारों की, भोजन आदि की बातें करतीं, लाली उन्हें डाँटकर रोक देतीं और फिर रामायण-भागवत के प्रसंग सुनातीं। दरवाजे के किवाड़, तखत आदि जो भी मिल जाता, उसे दोनों हाथों से बजातीं और भजन गातीं, लाली को गुड्डा-गुड़िया का खेल बहुत पसंद था। रोज ही यह खेल अवश्य खेला जाता। जब गुड्डा या गुड़िया  बीमार पड़ जाते तो डॉक्टर को दिखाकर दवाई दिलाई जाती। शिव-पूजा भी उनके खेल में शामिल थी। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वेलपत्र से विधिवत् पूजा होती। 'ॐ नम: शिवाय’ का जप होता। बड़ी श्रद्धा-भावना से पूजा का क्रम चलता। घंटों ध्यान लगाकर जप करतीं रहतीं। पिताजी से शिवपुराण सुनाने का आग्रह करती रहतीं। शिव कथा सुनकर बहुत प्रसन्न हो जातीं।

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