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अपना शरीर गायत्री जयंती 2 जून को छोड़ने की घोषणा परमपूज्य गुरुदेव, पहले से ही परम वंदनीया माताजी के समक्ष कर गए थे। इस अवधि में परम वंदनीया माताजी ने अपने पर पूरा संतुलन रख, 2 जून गायत्री जयंती को अपने आराध्य के महाप्रयाण के बाद करोड़ों बच्चों को हिम्मत बँधाकर अपने आँचल की छाया में ले लिया। 1, 2, 3, 4 अक्टूबर, सन् 1990 शरद पूर्णिमा के संकल्प श्रद्धांजलि समारोह में उपस्थित लाखों परिजनों के माध्यम से जन-जन को आश्वस्त कर दिया कि यह दैवीशक्ति द्वारा संचालित मिशन आगे-ही-आगे बढ़ता चला जाएगा। देव स्थापना का क्रम चलाकर लाखों घरों में आद्यशक्ति गायत्री माता को स्थापित कराया गया।
वंदनीया माताजी की उपस्थिति में 27 जून, सन् 1991 को आचार्य पं० श्रीराम शर्मा जी की स्मृति में भारत सरकार द्वारा एक रुपया का डाक टिकट जारी किया गया। जिसका विमोचन तत्कालीन उपराष्ट्रपति महामहिम डॉ० शंकरदयाल शर्मा एवं सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश माननीय श्री रंगनाथ मिश्र जी ने किया। सन् 1991 गायत्री जयंती को सविता शक्ति की प्रेरणा से परम वंदनीया माताजी ने शांतिकुंज से शक्ति साधना वर्ष की घोषणा की।
इसके बाद सन् 1992 में 6 से 8 जून के बीच शांतिकुंज में विराट शपथ समारोह का आयोजन कर देव संस्कृति का विस्तार करने के लिए लाखों लोगों को संकल्प दिलाया। सन् 1992 में ही वंदनीया माताजी द्वारा अश्वमेध यज्ञों की शृंखला की घोषणा की गई। उनके द्वारा प्रारंभ कराई गई अश्वमेध शृंखला का पहला यज्ञ 8 से 10 नवंबर, 1992 को जयपुर में हुआ। इस प्रकार 18 अश्वमेध माताजी के मार्गदर्शन में ही संपन्न हुए। इस आश्वमेधिक पुरुषार्थ ने वातावरण परिशोधन, सूक्ष्मजगत् के नवनिर्माण एवं सांस्कृतिक, वैचारिक क्रांति के नए आयाम प्रस्तुत किए। जन-जन में गायत्री और यज्ञ की चेतना का विस्तार किया।
क्या कुछ नहीं समाया था, वंदनीया माताजी के व्यक्तित्व में। आदर्श गृहणी, वात्सल्यमयी माँ, उत्कट तपस्विनी, आध्यात्मिक शक्तियों की दिव्य स्रोत, ओजस्वी वक्ता एवं कुशल व्यवस्थापिका आदि न जाने कितने रूपों में वे अपना प्रकाश बाँटती-बिखेरती रहीं। उनके जिस रूप को जिसने देखा, मुग्ध होकर देखता ही रह गया। जिनके हाथ में देश और समाज ने अपनी बागडोर सौंपी है, वे सब भी माताजी के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुदानों की चर्चा करते नहीं थकते।