स्वाध्याय योग युक्तात्मा परमात्मा प्रकाशते। अर्थात स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।—महर्षि व्यास

मातृसत्ता की जीवन यात्रा (महाशक्ति का अवतरण)

परमपूज्य आचार्यश्री की धर्मपत्नी, सहयोगिनी, स्नेहसलिला, वंदनीया, सजल श्रद्धारूपा, वात्सल्यमयी माँ आदि अनेक विशेषणों से विभूषित परमवंदनीया माता भगवती देवी शर्मा का जन्म 20 सितंबर, सन् 1926 को आगरा में श्री जसवंत बौहरे जी के घर संपन्न परिवार में हुआ। इनके पिता दया, दान, सेवा और उदारता के लिए पहचाने जाते थे। समाज में यश और सम्मान बहुत था। कन्या के जन्म के समय पंडितों ने बताया कि घर में कन्या शक्तिस्वरूपा दैवी सत्ता के रूप में आई है। यह कन्या साधारण से असाधारण बनती हुई करोड़ों व्यक्तियों की श्रद्धा का पात्र बनेगी। इनके चौके में लाखों व्यक्ति भोजन-प्रसाद ग्रहण करते रहेंगे। जो इनका आशीर्वाद पा लेगा, वह खाली हाथ नहीं जाएगा। शिव के साथ शक्ति की भाँति माताजी आचार्यश्री के जीवन में सहयोगिनी बनकर आईं। भविष्य में किए जाने वाले बड़े कार्यों में कंधे-से-कंधा मिलाकर सहयोग दिया। सेवा, सहयोग और समर्पण माताजी की विशेषताएँ थीं। जिनके कारण आचार्यश्री बड़े-बड़े संकल्पों को पूरा करने में समर्थ हो सके। आचार्यश्री स्वयं लिखते हैं कि यदि माताजी हमारे जीवन में साथ नहीं होतीं तो हम इतना काम नहीं कर पाते।

पूज्य गुरुदेव का कठोर अनुशासन और वंदनीया माताजी का वात्सल्य भरा दुलार, दोनों ने मिलकर वसिष्ठ-अरुंधती युग्म की भाँति युगनिर्माणियों का सृजन किया। स्नेह भरा आतिथ्य, पीड़ितों-दु:खियों को ममत्व भरा परामर्श देकर विशाल गायत्री परिवार खड़ा कर दिया। ॠषियुग्म ने ब्राह्मणत्व का जीवन, ओढ़ी हुई गरीबी से युक्त त्याग-तपस्या का आदर्श जीवन जीकर दिखाया, जिसने हर अतिथि को प्रभावित किया।

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