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गायत्री तपोभूमि – युगनिर्माण योजना
मुझे नरक में भेज दो, वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों | —लोकमान्य तिलक

माताजी के दायित्व

दोनों जब भी साथ बैठते भविष्य की नई संभावनाओं पर चर्चा होती थी। आरंभ के दिनों में वंदनीया माताजी को लगता था कि वे घर-परिवार के सदस्यों से पहले से परिचित हैं। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के साथ-साथ माताजी ने भी इस विश्व उद्यान के पुष्प-पादपों को निरंतर खाद-पानी देने की व्यवस्था में अपना संपूर्ण जीवन अर्पण किया। अपनी भावी रीति-नीति के अनुरूप अपने आराध्य के संसर्ग में रहकर समय-समय पर अनेक विशिष्ट साधनाओं का ज्ञान प्राप्त करती रहीं। धीरे-धीरे अपनी नियमित साधना भी आरंभ कर दी थी।

अखंड दीपक को प्रज्वलित रखने का दायित्व पूर्णतया वंदनीया माताजी ने सँभाल लिया। गाय को जौ खिलाना, गोबर से निकले जौ को धोना, साफकर-सुखाकर, पीसना इत्यादि कार्य स्वयं ही करती थीं।

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