Severity: Warning
Message: fopen(/tmp/ci_session74bc7dbab64f0e570324b238a8b49a47baef2b9d): failed to open stream: Disk quota exceeded
Filename: drivers/Session_files_driver.php
Line Number: 177
Backtrace:
File: /home/kkjbnlfz/yugnirmanyojna.org/index.php
Line: 315
Function: require_once
Severity: Warning
Message: session_start(): Failed to read session data: user (path: /tmp)
Filename: Session/Session.php
Line Number: 137
Backtrace:
File: /home/kkjbnlfz/yugnirmanyojna.org/index.php
Line: 315
Function: require_once
आचार्य जी ने गांधी जी से मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु साबरमती आश्रम की कई बार यात्रा की। इसी अवधि में आचार्य जी रवींद्रनाथ ठाकुर, आचार्य विनोबा भावे, महर्षि अरविंद, बालकृष्ण शर्मा नवीन, बी० वी० केसकर, बाबू गुलाबराय आदि के सान्निध्य में समय-समय पर रहे। रेल, डाक, तार व्यवस्था को भंग करने में एक क्रांतिकारी दल बनाकर भी कार्य किया।
आचार्य जी को बरहन मंडल कांग्रेस कमेटी का महामंत्री नियुक्त किया गया था। वे नमक सत्याग्रह और लगानबंदी आंदोलनों में हिस्सा लेने वालों में सबसे अग्रिम पंक्ति के नेता थे। विदेशी वस्त्रों तथा वस्तुओं का बहिष्कार, नशाखोरी के विरुद्ध पिकेटिंग, बाल भारत सभा का गठन, ग्राम-ग्राम प्रचार, चौकीदारों, मुखियाओं से स्तीफे दिलाने आदि कार्यों में आचार्य जी की भूमिका तपे हुए सैनिक जैसी रही।
पूँजीवाद, जनसंख्या वृद्धि, शिक्षा प्रसार, कन्याओं के साथ भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों पर वे सशक्त लेख लिखते थे, जो ‘दैनिक सैनिक’ समाचारपत्र में नियमित छपते थे। सामाजिक कुरीतियों को वे राजनीतिक पराधीनता का कारण मानते थे।
बापू ने एक बार कहा कि स्वाधीनता तभी परिपुष्ट होगी, जब राजनीति के साथ धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण का कार्य चले। आचार्य जी को वे इस कार्य के योग्य मानते थे, गांधी जी का निर्देश मानते हुए आचार्य जी ने इसी क्षेत्र में कार्य करने के लिए आगरा से मथुरा में आकर निवासस्थान बनाया। साबरमती आश्रम की तरह मथुरा में गायत्री तपोभूमि आश्रम का शुभारंभ किया। घीयामंडी, मथुरा में स्वतंत्र प्रेस लगाकर सन् 1940 से ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का नियमित प्रकाशन प्रारंभ किया, जो आज दस भाषाओं में लाखों की संख्या में छपती है।
आचार्य जी ने स्वतंत्रता आंदोलन के बाद से ही वैदिक साहित्य, आर्ष साहित्य को अपने मूल रूप में सरल हिंदी टीका सहित प्रस्तुत करने की भूमिका अपने मन में बना ली थी।
एक दिन मालवीय जी ने कहा—‘‘यदि कांग्रेस को लोकप्रिय बनाना है तो हर घर से एक मुट्ठी अनाज या एक पैसा संग्रह करना चाहिए, ताकि जनता समझे कि कांग्रेस हमारी है।’’ पं० श्रीराम शर्मा जी को यह सूत्र समझ में आ गया। उन्होंने युग निर्माण योजना को लेकर गायत्री परिवार खड़ा करने तक इसी सूत्र को व्यवहार में उतारा। उसी के फलस्वरूप मिली—अपार श्रद्धा, जनसहयोग, प्रत्येक की आत्मीयता। प्रत्येक गतिविधि के मूल में अंशदान आज भी जिंदा है। इसी से संगठन बना है।
आचार्य जी का जिन महापुरुषों से संपर्क रहा, उनमें समाज के हर वर्ग के विशिष्ट जन थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, जयदयाल गोयन्दका, संत डोगरे जी, गुरु गोलवरकर, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महात्मा आनंद स्वामी, गुलजारीलाल नंदा, राजा महेंद्र प्रताप, बालासाहेब देवरस, बिरला जी, शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, देवरहा बाबा, नीम करोरी बाबा, स्वामी विशुद्धानंद , कृष्ण दत्त पालीवाल, जगन प्रसाद रावत जी, अनंतशयनम आयंगर, भक्ति वेदांत स्वामी, माता आनंदमयी आदि सैकड़ों से अधिक की संख्या में उन्हें चाहने वाली विभूतिवान प्रतिभाएँ थीं।