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अखण्ड ज्योति पत्रिका प्रकाशन के लिए पहले आगरा, फिर मथुरा में रहना पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी को अनिवार्य हो गया। बाद में घीयामंडी, मथुरा में मकान खरीद लिया गया। साधकों और जिज्ञासुओं के आवागमन की संख्या बढ़ने लगी थी। यहाँ पर माताजी ने अनेक जिम्मेदारियाँ एक साथ सँभालीं। सबसे पहले उठतीं, सबसे बाद में सोती थीं। आने वालों के लिए भोजन बनाना, घर के अन्य सारे कार्य करके कार्यालय के कार्यों में सहयोग देती थीं। जप, ध्यान, पूजा नियमित चलती रही। कभी वंदनीया माताजी को किसी ने चिड़चिड़ाते या गुस्सा होते नहीं देखा। बाद में घर में काम बढ़ने पर पूज्य गुरुदेव ने सहयोग के लिए एक महिला की व्यवस्था कर दी थी।
अखण्ड ज्योति संस्थान में निवास के इन्हीं प्रारंभिक वर्षों में दो संतानों की वंदनीया माताजी जननी बनीं। पवित्र कोख से पहले श्री मृत्युंजय शर्मा (श्री सतीश शर्मा भाईसाहब) तथा बाद में श्रीमती शैलबाला (जीजी) का जन्म हुआ।
कार्यालय, घर-परिवार के काम-काज की व्यस्तताएँ कितनी भी क्यों न रही हों, परंतु मातृत्व का आँचल कभी छोटा नहीं पड़ा। वे कहा करतीं थीं कि ‘‘मैं केवल सतीश या शैलो की ही माँ नहीं हूँ, मैं सब की माँ हूँ।’’
परिजनों की अत्यधिक बढ़ती संख्या उनके मार्गदर्शन और साधना के लिए उपयुक्त स्थान (आश्रम) आदि की जरूरतों को देखते हुए गायत्री तपोभूमि के निर्माण की योजना ॠषियुग्म (श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा) के हृदय में अवतरित हुई। उसको साकार रूप देने का उनका दिव्य प्रयत्न गायत्री तपोभूमि के रूप में सभी के सामने आया, जिसके लिए उन्होंने ॠषि दुर्वासा की तपस्थली को चुना, जो हजारों वर्षों से गायत्री-साधना की सिद्धभूमि रही है।