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गायत्री तपोभूमि – युगनिर्माण योजना
स्वाध्याय योग युक्तात्मा परमात्मा प्रकाशते। अर्थात स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।—महर्षि व्यास

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान (हरिद्वार) की स्थापना

सन् 1979 में आचार्य जी ने 2400 शक्तिपीठ स्थापित करने का संकल्प लिया ।  सन् 1980-1981 में आचार्य जी ने देशव्यापी दौरे किए । उनके द्वारा सन् 1979 में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना हुई, जहाँ विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर शोधकार्य किया जाने लगा । अदृश्य जगत् के अनुसंधान से लेकर मानव की प्रसुप्त क्षमता के जागरण तक, साधना से सिद्धि एवं दर्शन विज्ञान, मंत्र चिकित्सा, यज्ञोपैथी एक विज्ञानसम्मत विधा आदि पर शोध करने हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का निर्माण किया गया ।

मानव मस्तिष्क प्रायः हर बात को वैज्ञानिक संदर्भ से ही समझने का अभ्यस्त हो गया है, इसलिए पूज्यवर ने जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक सूत्रों को वैज्ञानिक आधार पर समझाने-स्थापित करने के लिए इस शोध केंद्र का शुभारंभ 1979 की गायत्री जयंती पर किया । यह संस्थान अपने अनोखेपन के कारण विश्वस्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है ।

गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज के मुख्य परिसर से आधा किलोमीटर दूर गंगातट पर अवस्थित यह संस्थान अपनी भव्यता के कारण सहज ही ध्यान आकर्षित करता रहता है । भूतल पर वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित यज्ञशाला विनिर्मित है । चौबीस कक्षों में गायत्री महाशक्ति की चौबीस मूर्तियाँ बीज मंत्रों, फलश्रुतियों सहित स्थापित हैं ।  प्रथम तल पर वैज्ञानिक प्रयोगशाला है, जहाँ ऐसे उपकरण स्थापित हैं, जिनसे साधकों की साधनाकाल में जाँच-पड़ताल की जाती है । साधना से पूर्व व पश्चात, यज्ञादि मंत्रोच्चार के पूर्व व पश्चात क्या-क्या परिवर्तन शारीरिक व मानसिक स्तर पर होते हैं, अब यह देखना आसान हो गया है ।  इसके आधार पर साधकों को साधना संबंधी परामर्श दिया जाता है ।

यहाँ पर वनौषधियों का विश्लेषण भी किया जाता है ।  यज्ञ ऊर्जा, मंत्र शक्ति का क्या प्रभाव साधक की मस्तिष्कीय तरंगों, जैव ​विद्युत आदि पर पड़ा यह देखा जाता है । विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी यहाँ किए जाते हैं । द्वितीय तल पर एक विशाल संदर्भ ग्रंथागार है, जहाँ वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर विश्व भर के शोध ग्रंथ एकत्रित किए गए हैं । यहाँ प्रायः 45000 से अधिक पुस्तकें हैं । पुरातन पांडुलिपियाँ भी हैं । बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित, निष्ठावान शोधकर्त्ता औसत भारतीय स्तर पर जीवनयापन करते हुए शोध एवं संपादन कार्यों में लगे हुए हैं ।

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