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परमवंदनीया माताजी साक्षात् शक्तिस्वरूपा थीं। परमपूज्य गुरुदेव के साथ लगभग 45 वर्ष रहकर उन्होंने गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना को सशक्त, सफल बनाने में कोई कमी नहीं रखी । पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के पश्चात 1990 से 1994 के चार वर्षों में उन्होंने 40 वर्षों से अधिक का कार्य कर दिखाया । संकल्प श्रद्धांजलि समारोह, शपथ समारोह, अश्वमेध यज्ञों का आयोजन, देव स्थापना, वेद स्थापना आदि कार्यों को सफल बनाते हुए मिशन को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचा दिया। पूज्य गुरुदेव से लंबा विछोह उनके लिए असहनीय हो रहा था, इसका संकेत 1994 के आरंभिक दिनों में उन्होंने देना आरंभ कर दिया था। जब चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ और वंदनीया माताजी ने उसमें भाग लिया तो वहीं बोल दिया कि अब वे किसी और आयोजन में नहीं जाएँगी।
वंदनीया माताजी ने पूज्य गुरुदेव की तरह ही कितनों का कष्ट अपने ऊपर झेला था। उनका जीवन दूसरों को सुखी समुन्नत बनाने में ही लगा रहा। शारीरिक कमजोरी और बीमारी की स्थिति में भी वे लोकहित के कार्यों में सतत तत्पर रहीं ।
उन्होंने महाप्रयाण से कुछ दिन पहले शांतिकुंज के सभी कार्यकर्त्ताओं को एक-एक करके बुलाया, सभी को आश्वासन दिया कि मेरे शरीर के छूटने के बाद भी तुम सभी को गुरुदेव का एवं हमारा प्यार संरक्षण सदैव मिलता रहेगा। तुम लोग बिना गड़बड़ाए अपने कर्त्तव्य पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना।
भाद्रपद पूर्णिमा महालय का दिन था, अँगरेजी तिथि के अनुसार 19 सितंबर, 1994 को वंदनीया माताजी पूर्वाह्न वेला में 11 बजकर, 50 मिनट पर अपने स्थूल शरीर का परित्याग कर गुरुसत्ता, इष्टसत्ता में विलीन हो गईं। उनके महाप्रयाण की खबर परिजन पाकर स्तब्ध रह गए, पर माताजी अपने गंतव्य की ओर जा चुकी थीं। अगले दिन 20 सितंबर को उनका पार्थिव शरीर अंत्योष्टि द्वारा पंच तत्त्वों में समाहित कर दिया गया। अंतिम संस्कार में उपस्थित हजारों नर-नारियों ने उन्हें अश्रुपूरित विदाई दी। स्थूल से सूक्ष्म में जाकर माँ ने कोटि-कोटि हृदयों में अपना स्थान बना लिया।