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गायत्री तपोभूमि – युगनिर्माण योजना
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मय  तप उच्यते। अर्थात स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है । —गीता 17/15

अखण्ड ज्योति पत्रिका के संबंध में अभिमत

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‘‘तुम और तुम्हारी पत्रिका अखण्ड ज्योति, दोनों सदा यशस्वी बने रहेंगे।"

  —  आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 

 (हिंदी के महान विद्वान सरस्वती पत्रिका के संपादक)

 

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"अखण्ड ज्योति पत्रिका के स्पर्श से ही मुझे आपकी प्राण-चेतना का स्पर्श मिल गया था। विचारों की जिस दिव्यकक्षा से अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है,उसका अनुभव मुझे आपसे मिलकर हो गया। विचारों की दिव्यकक्षा में स्वयं प्रतिष्ठित होना अलग बात है और एक बड़े समूह को उस ओर लेकर चल पड़ना बिलकुल अलग कार्य है। विचारों की दिव्यकक्षा में स्वयं की प्रतिष्ठा अब तक अनेक लोग कर चुक़े हैं, पर बड़े व्यापक समूह को उस परम कक्षा की ओर ले चलने का साहस सिर्फ आप कर रहे हैं।"

—      पं० गोपीनाथ कविराज

 (संस्कृत के प्रकांड विद्वान, तपस्वी एवं महान दार्शनिक)

 

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‘‘अरे ! वे तो महादेव हैं, उन्हें महादेवी का सहयोग प्राप्त है। उन्होंने स्वयं को आवरण में छिपा रखा है।व्यावहारिक रूप से तो किसी भी तरह उनका यथार्थ परिचय प्राप्त होना संभव नहीं है, लेकिन इस पत्रिका के माध्यम से उनके संदेश भी मिलते हैं और उनका परिचय भी बड़ी सहजता से प्राप्त होता है। हालाँकि, यह भी पात्रभेद के अनुसार ही हो पाता है।"

 —  माता आनंदमयी

  (महान संत, तपस्वी)

 

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"यही है सच्चा अध्यात्म, जो लेखक के हृदय से छलक रहा है। ’’ इसके बाद उन्होंने इससे आगे का पूरा पृष्ठ पढ़ा और बोले—‘‘इसे कहते हैं एक उत्कृष्ट शब्दशिल्पी। इस लेखन में एक-एक शब्द का वही महत्त्व है, जो किसी विशाल अट्टालिका की प्रत्येक ईंट का होता है। उसकी एक ईंट जरा-सी सरका दी जाए तो पूरी अट्टालिका गिर जाएगी। बस, यही बात अखण्ड ज्योति के लेखों की है, एक भी शब्द इधर से उधर कर देने पर सब कुछ अव्यवस्थित और सौंदर्यविहीन होने का भारी खतरा है। इस अनूठी पत्रिका की एक बात यह भी है कि इसके ज्यादातर लेख स्वयं संपादक द्वारा लिखे जाते हैं। पूरी पत्रिका पढ़ने पर लगता है कि कहीं ज्वालामुखी की तरह आग उगलता अंतर्मन है, तो कहीं दार्शनिक विचारशीलता की गंगा की शीतल लहरें। कहीं प्रचंड पौरुष की हुंकार है, तो कहीं करुणा भरी पुकार। सच कहें तो यही है, संपादकीय— संवाद की संवेदनशीलता।’’

 —  माखनलाल चतुर्वेदी

 (महान साहित्यकार, प्रभा, कर्मवीर और प्रताप के संपादक)

 

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‘‘संपादकीय में लिखे गए ये शब्द, लेखनी से नहीं, बल्कि लिखने वाले के दिल की गहराई को चीरकर निकले हैं। इसे कोई सबसे अपना ही कह सकता है और कोई सबसे अपना ही समझ सकता है। इसलिए अखण्ड ज्योति में लिखा जाने वाला संपादकीय-संवाद की संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। ’’

 —  धर्मवीर भारती 

(पत्रकार-साहित्यकार, धर्मयुग के संपादक)

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"अखण्ड ज्योति के लेख भी भगवान की वाणी की तरह हैं। इस पर किसी व्यक्ति विशेष की कोई छाप संभव नहीं है। इसमें जो कुछ भी है, सबका सब आचार्य जी का है, किसी और का कोई स्वत्व इसमें नहीं है। इसलिए जो इसे पढ़ेगा, इस पर विचार-मंथन करेगा, वह सीधे उनकी पराचेतना से जुड़ जाएगा। भले ही वह उनसे मिला हो अथवा न मिला हो।"

—     देवरहा बाबा

 (महान तपस्वी, दिगंबर संत)

 

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"अखण्ड ज्योति पत्रिका तुम पढ़ा करते हो, उसके संचालक आचार्य जी चिंतनशील होने के साथ कर्त्तव्यनिष्ठ हैं। मैं तो उन्हें आधुनिक भारत का परशुराम कहता हूँ। अपने विचारों व कर्मनिष्ठा का धारदार परशु लिए निकल पड़े हैं—देश की बुराइयों को जड़ से काटने। पता नहीं उनके लिखे का, उनके किए का महत्त्व देश कब समझेगा और किस तरह समझेगा, पर वह है सचमुच ही महत्त्वपूर्ण। अखण्ड ज्योति के लेखों में चिंतन है, विश्लेषण है, मानव के सही स्वरूप की खोज है। इसमें छपने वाली कहानियाँ प्रेरक हैं, उद्दीपक हैं। इसमें प्रकाशित होने वाली लघु कथाएँ बिहारी के दोहों की तरह—‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर’ हैं और इसकी कविताएँ, युगधर्म का बोध कराती हैं।"

—       रामधारी सिंह दिनकर

 (राष्ट्रकवि, इतिहास दर्शन राजनीति के विद्वान)

 

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“अखण्ड ज्योति की विचारशैली, भारत की संस्कृति, यहाँ की सामाजिक संरचना, परिवार के रिश्तों की बुनावट के सबसे अनुकूल है। इस संबंध में दूसरी बात यह है कि आध्यात्मिक पत्रिका होते हुए भी इसमें घर-परिवार, रिश्ते-नातों का पूरा सम्मान है। तीसरी बात जो इस संदर्भ में विशेष महत्त्वपूर्ण है, वह यह कि केवल यही एक ऐसी पत्रिका है, जिसने घर-परिवार को, गृहस्थ जीवन को तपोवन की संज्ञा दी है। गृहस्थ जीवन की ऐसी परिभाषा कहीं अन्यत्र देखने-सुनने को नहीं मिलती।”

—       आशा रानी व्होरा

(प्रसिद्ध साहित्यकार एवं समाजसेवी)

 

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"लोकसेवा-समाजसेवा के प्रशिक्षण को आचार्य जी ने आध्यात्मिक दृष्टि दी है। इसे उन्होंने जीवन-साधना, आध्यात्मिक साधना का स्वरूप प्रदान किया है। आचार्य जी और उनकी अखण्ड ज्योति तो लोकसेवा-प्रशिक्षण की पाठशाला हैं।’’

—       हीरालाल शास्त्री

 (प्रथम मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार, प्रसिद्ध शिक्षाविद्, समाज सुधारक)

 

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‘‘आचार्य जी ने अखण्ड ज्योति के माध्यम से न केवल वैज्ञानिक अध्यात्म को नया आयाम दिया, बल्कि लोगों को घर बैठे जीवन जीने की कला का शिक्षण भी दिया।’’

 —  स्वामी आत्मानंद

 (रामकृष्ण आश्रम, रायपुर)

 

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 "सुधा  बीज  बोने  से  पहले  कालकूट  पीना  होगा।
पहन मौत का मुकुट विश्वहित, मानव को जीना होगा।।"

इन पंक्तियों को पढ़कर  कहा अभी भी हिंदी साहित्य में शिवत्व शेष है।

 —  सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 

 (हिंदी साहित्य के यशस्वी प्रकाशपुंज)

 

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‘‘वितरण की अनूठी व्यवस्था अखण्ड ज्योति को भी आध्यात्मिक, वैचारिक क्रांति के प्रतीक रूप में देश में और विदेश में घर-घर पहुँचाना चाहिए।’’

—      राजा महेंद्र प्रताप सिंह

 (दानवीर, महान क्रांतिकारी, शिक्षाविद्, समाजसुधारक)

 

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‘‘साहित्य शिल्प का अनूठापन झलकता है अखण्ड ज्योति में। इसे किसी दायरे में तो नहीं बाँधा जा सकता, लेकिन अपने आप ही अनेकों दायरे इसमें सिमट जाते हैं। ’’

"उनके शब्द भी केवल अक्षरों का समूह नहीं हैं, बल्कि विचारों की ऐसी संरचना है, जो उद्देश्य व आवश्यकता के अनुरूप स्वयं को निरंतर प्रकाशित, परिवर्तित एवं परिवर्द्धित करती है और अँधियारे कोने में उजाला उँड़ेलने के लिए प्रयत्नशील रहती है। उनके साहित्य में जो सबसे विलक्षण बात मुझे लगी, वह यह है कि वह पढ़ने वाले की संवेदना और उसके पराक्रम को एक साथ झकझोरता है। अनेकों अंश भरे पड़े हैं आचार्य जी के साहित्य में, जो उनके साहित्य की बुनावट व बनावट को दरसाते हैं।"

"उनका साहित्य लेखन सरल है और कठिन भी, कोमल है और कठोर भी। उनके थोड़े अक्षरों में अनंत अर्थ हैं। इस बारे में सबसे बड़ी बात तो यह है कि उन्होंने आध्यात्मिक पत्रकारिता का नया अध्याय प्रारंभ किया।"

 —  अमृतलाल नागर

 (प्रसिद्ध साहित्यकार)

 

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‘‘मैं समझता हूँ कि जिन्होंने भी ये पंक्तियाँ लिखी हैं, वे सचमुच ही ॠषि हैं। उन्हें इन पंक्तियों को लिखते समय अवश्य पता था कि देश की स्वाधीनता सुनिश्चित है और स्वाधीन भारत को वैज्ञानिक अध्यात्म के रूप में चिंतन, दर्शन के सर्वथा नए आयाम की आवश्यकता है। ’’

—     डॉ० राजा रमन्ना 

 (परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक)

 

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‘‘घर बैठे जीवन जीने की कला का शिक्षण आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है हर आयु के लोगों के लिए, हर परिस्थिति में जीने वालों के लिए इस आवश्यकता को पूरा करने का काम अखण्ड ज्योति कर रही है। यह पत्रिका अपने आप में पत्रिका के रूप में विलक्षण तो है ही, लेकिन साथ में और भी बहुत कुछ है। मैं तो इसे जीवन जीने की कला की प्राथमिक पाठशाला, माध्यमिक पाठशाला, महाविद्यालय और यहाँ तक कि जीवन जीने की कला का विश्वविद्यालय तक मानता हूँ। यह बात सुनने वालों को कितनी ही अटपटी क्यों न लगे, पर अनुभव किया हुआ सच है। जिनकी जितनी योग्यता है, जो जितना सीखेंगे, जानने में सक्षम हैं, उसके अनुरूप यह पत्रिका उन्हें सिखा देती है। ’’

—     स्वामी केशवानंद

 (शिक्षा संत)

 

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‘‘मुझे भारी प्रसन्नता है कि कोई तो है, किसी ने तो पुरातन शास्त्रों के ज्ञान को समझने व समझाने की कोशिश की है।’’
‘‘यह पत्रिका यथार्थ में पुरातन शास्त्रों की सामयिक व्याख्या है।’’ ‘‘अखण्ड ज्योति के लेखों में न केवल पुरातन ज्ञान का सामयिक प्रस्तुतीकरण है, बल्कि उसका विधिपूर्वक शिक्षण भी है। फिर इस सभी को गायत्री के तत्त्वदर्शन में पिरोया भी गया है। ’’

—      पं० श्रीपाद दामोदर सातवलेकर

(महान क्रांतिकारी, संस्कृत के उद्भट विद्वान, लेखक, मनस्वी, मनीषी)

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"मुझे अखण्ड ज्योति में प्रतिपादित किया जाने वाला समाज दर्शन व अध्यात्म दर्शन एक साथ संवेदित और प्रेरित करता है। इसमें एकता, समता और शुचिता का जो प्रतिपादन है, उसने मार्क्सवाद को बड़े ही मौलिक व नैसर्गिक ढंग से आध्यात्मिक बना दिया है। इसमें आर्थिक, सामाजिक, नैतिक ऐसे कई आयाम हैं, जो शोध का महत्त्वपूर्ण बिंदु बन सकते हैं। हो सके तो मेरी इन बातों को शोधकर्मियों तक अवश्य पहुँचाना। इसका एक तथ्य और भी है, जो मुझे सतत प्रेरित करता है, वह यह है कि इसका साहित्यिक प्रतिपादन विश्वदर्शन का आधार बन सकता है।"

—       रांगेय राघव

  (महान साहित्यकार)

 

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‘‘अब जब इस समय अपने जीवन की समीक्षा करता हूँ तो पाता हूँ, मैंने अपने जीवन में कई कार्य ऐेसे किए, जिन्हें आचार्य जी ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर लिखा था। इन कार्यों के बारे में सोचने पर अब लगता है, जैसे कि किसी अदृश्य प्रेरणा ने मुझसे वह सब करवा लिया और मुझे श्रेय व सम्मान का उपहार दिया। मैं यह स्पष्ट कहता हूँ कि मैंने अपने जीवन में जो भी श्रेष्ठ किया, वह मेरे मार्गदर्शक की लेखनी, वाणी एवं उनके द्वारा ही दी गई अंत:प्रेरणा के कारण हो सका। ’’

—     श्री भैरोंसिंह शेखावत

(भारत के उपराष्ट्रपति)

 

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‘‘अखण्ड ज्योति को इसके पाठकों की पीढ़ियाँ पढ़ेंगी और सँजोकर धरोहर की तरह रखेंगी। इसमें तथ्य है, सत्य है, विचार प्रेरणाएँ हैं, इन सबके साथ इसमें एक सबसे बेशकीमती बात और भी है—आचार्य जी का तप। जिसके कारण इसका जितना सामयिक महत्त्व है, उतना ही शाश्वत महत्त्व भी है। ’’

—      सत्यभक्त

(क्रांतिकारी लेखक, सत्ययुग, युगवीर, प्रताप, चाँद पत्रिकाओं के संपादक)
(भारत में कम्युनिष्ट पार्टी के संस्थापक)

 

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‘‘इस पत्रिका में शब्द किसी के द्वारा और कहीं भी क्यों न लिखे जाते हों, पर इसके चेतना सूत्र हिमालय से जुड़े हुए हैं। जो भी इस पत्रिका के विचारों, लेखों से स्वयं को जोड़ता है, इन पर चर्चा व चिंतन करता है, वह अनजाने में ही हिमालय के डिवाइन मास्टर्स से जुड़ जाता है, फिर वे उसे स्वयं ही सुरक्षा-संरक्षण व मार्गदर्शन तथा सहायता देने लगते हैं।"

—    जे. कृष्णमूर्ति

 (महान अध्यात्मवेत्ता, मनोवैज्ञानिक)

 

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“मुझे यह सुखद लगा कि अखण्ड ज्योति भारतवासियों को उनकी भाषा से और इस देश की संस्कृति, परंपरा व गरिमा से परिचित करा रही है। मैं स्वयं भी ऐसे कई लोगों को जानता हूँ, जिन्होंने अखण्ड ज्योति पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। अखण्ड ज्योति का पठन-पाठन और प्रचार करते रहो। यह भारत, भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के लिए जरूरी है। देर-सवेर यही भारतीय जनमानस पर आध्यात्मिक साम्यवाद की दस्तक दे सकेगी।’’

—     फादर कामिल बुल्के

 (हिंदी, संस्कृत, अँगरेजी के महान विद्वान लेखक, पद्मभूषण से सम्मानित)

 

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“आध्यात्मिक साधनाओं का मार्गदर्शन करने के लिए तेरे पास अखण्ड ज्योति है न, उसके लेखों से प्रकाश प्रवाहित होता है, उसी से तेरा कल्याण होगा।” ‘‘अखण्ड ज्योति के प्रति श्रद्धा तुम्हारी चेतना को उनसे जोड़ देगी, फिर सब कुछ स्वत: मिलता रहेगा। मैं जो कह रहा हूँ, उसे स्वीकारोगे तो अखण्ड ज्योति का जीवन दर्शन तुम्हें स्वयं जीवन के सत्य स्वरूप का दर्शन करा देगा। ’’

—     बाबा नीम करौरी

 

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‘‘मानव कल्याण किसमें है? मानव कल्याण है, मानव के विकास और परिष्कार में। यह स्वर अखण्ड ज्योति का है, आध्यात्मिक मानवतावाद का है, उसके प्रणेता आचार्य जी का है। ’’

—    राजेंद्र माथुर”

 (प्रसिद्ध पत्रकार, नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक)

 

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‘‘अखण्ड ज्योति पत्रिका प्रेरक है, इसके लेखों में विचारों को दिशा देने की क्षमता है। धार्मिक-आध्यात्मिक पत्रिका होने के बावजूद इसमें सामाजिक कर्त्तव्यों के प्रति उत्तरदायित्व का बोध है। सबसे बड़ी बात यह कि इसके लेख पढ़ने से लगता है मानो इसके लेखक और संपादक नारी-संवेदना से संवेदित होते हैं। उनका हृदय नारी के दरद से द्रवित होता है और वह इसे दूर करने के लिए प्रयत्नशील भी हैं। जहाँ तक नारी अभ्युदय के नवयुग की बात है, तो इसकी सचाई पर मुझे भरोसा होता है। मुझे भी लगता है, भारतमाता को स्वाधीन कराने वाला परमेश्वर नारी जीवन को भी स्वाधीनता देगा आज की पराश्रित नारी आने वाले समय में आश्रयदाता की भूमिका निर्वाह करेगी।’’

—     महादेवी वर्मा

(महान कवि, लेखक, पद्मभूषण,  ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि अनेक सम्मान प्राप्त)

 

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‘‘मैं इसके लेख पढ़ती हूँ, इसलिए नहीं कि इसे किसी बड़े विद्वान ने लिखा है, बल्कि इसलिए क्योंकि इसके लेखक ने तब से लेकर आज तक अपनी क्रांतिकारी भावना पर आँच नहीं आने दी। अभी भी उनके अंदर क्रांति की वही ज्वाला धधक रही है और वह अपने अनुगामियों को इसके लेखों के माध्यम से क्रांति के धधकते हुए अंगारे दे रहे हैं।’’

—     दुर्गा भाभी

(महान क्रांतिकारी)

 

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‘‘आध्यात्मिक चिकित्सा की औषधि है—अखण्ड ज्योति पत्रिका। जो इसे पढ़ते हैं, इसके विचारों पर चिंतन करते हैं, इन्हें स्वयं के जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं, वे सभी इस सचाई को जरूर महसूस करते होंगे। कम- से -कम मेरा अपना अनुभव तो यही है। लंबे समय से मेरा-इसका साथ रहा है।’’

—    डॉ. इंद्रसेन 

 (भारतीय एवं पाश्चात्य मनोविज्ञान के महान विद्वान)

 

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‘‘राजनीतिक जीवन का मटमैलापन हमेशा ही अपने व्यक्तित्व व अस्तित्व से लिपटा रहता है। स्वयं अपने मन में भी अनेकों इच्छाएँ, कामनाएँ हैं, जो जीवन को इधर-उधर घुमाती-घसीटती रहती हैं।’’
‘‘ऐसी स्थिति में संबल बनती है—अखण्ड ज्योति। इसके माध्यम से जो आपके विचारों की फुहार आती है, उससे अशांति, असंतोष, संताप की तपिश क्षीण हो जाती है। मन को, जीवन को ताजगी मिलती है, सकारात्मक विचारों की ऊर्जा से फिर नए काम का जोश जगता है | उलझनों में, संकटों में नई राहें खुलती हैं | मैं समझता हूँ कि मैं ही क्यों, यही स्थिति औरों की, अनेकों की होगी।"

—     हरदेव जोशी

 (राजस्थान के मुख्यमंत्री असम, मेघालय और पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल)

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‘‘आचार्य जी आपके लेखों को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे यह गंगा की कल-कल करती जलधारा है, ऐसी अभूतपूर्व शब्द सरिता है, जिसमें विचार प्रवाहित होते हैं। इसमें भावनाओं की ऐसी भँवरें बनती हैं, जो बरबस ही पढ़ने वालों को अपने में समेटते हुए अंदर डुबो देती हैं और यह डूबना बड़ा ही सुखकारी और आनंददायक होता है।’’

‘‘कोई अखण्ड ज्योति को किस रूप में अनुभव करता है, मुझे नहीं पता, पर मुझे इसमें साहित्य व दर्शन के नए-नए रंगों की अनुभूति होती है। साथ ही इसमें सर्वथा नए संदेश की झलक मिलती है।’’

—    नरेंद्र मोहन

(प्रसिद्ध पत्रकार, दैनिक जागरण के प्रधान संपादक,

उत्तर प्रदेश संगीत नाट्य अकादमी व प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया के चेयरमैन)

 

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